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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 14

विधि के समक्ष समता

विधि के समक्ष समता-राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अनुच्छेद 14 को इस उद्देश्य से जोड़ा गया कि जन्म, जाति, धर्म या दर्जे के आधार पर औपनिवेशिक और पूर्व-औपनिवेशिक भारत में प्रचलित असमान व्यवहार की परंपरा समाप्त हो। ब्रिटिश “कानून के समक्ष समता” और अमेरिकी “समान संरक्षण” (equal protection) की परंपराओं से प्रेरणा लेकर, निर्माताओं ने सुनिश्चित करना चाहा कि राज्य व्यक्तियों के पक्ष में या उनके विरुद्ध मनमाने ढंग से व्यवहार न कर सके, ताकि एक विविध, नवस्वतंत्र राष्ट्र में निष्पक्षता की बुनियाद स्थापित हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

आरंभिक दौर में सर्वोच्च न्यायालय ने “उचित वर्गीकरण” (reasonable classification) परीक्षण अपनाया, जिसके तहत यदि वर्गीकरण उचित हो और किसी वैध उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा हो तो कानून समूहों के साथ भिन्न व्यवहार कर सकते हैं (State of West Bengal v. Anwar Ali Sarkar, 1952)। बाद में E.P. Royappa v. State of Tamil Nadu (1974) तथा Maneka Gandhi v. Union of India (1978) में न्यायालय ने अनुच्छेद 14 का दायरा बढ़ाते हुए राज्य की ‘मनमानी’ को ही अस्वीकार कर दिया, यह मानते हुए कि समानता और मनमानी परस्पर विरोधी हैं। इससे अनुच्छेद 14 की पहुँच साधारण वर्गीकरण से आगे बढ़कर सरकार के निर्णयों की समग्र निष्पक्षता की जांच तक फैल गई।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 14 का मतलब यह नहीं है कि हर कानून में सभी के साथ हर समय हूबहू एक जैसा व्यवहार किया ही जाए।

    तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि उचित वर्गीकरण मान्य है—यदि किसी वैध लक्ष्य से तार्किक रूप से जुड़ा हुआ न्यायसंगत कारण हो, तो कानून भिन्न समूहों के साथ भिन्न व्यवहार कर सकते हैं (सरल रूप में)।

  • मिथक: अनुच्छेद 14 केवल भारतीय नागरिकों की रक्षा करता है—यह कथन गलत है।

    तथ्य: यह अनुच्छेद भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर “किसी भी व्यक्ति” की रक्षा करता है, जिसमें विदेशी भी शामिल हैं, केवल नागरिक ही नहीं।