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सं Samvidhan

Property & economic liberty

R.C. Cooper v. Union of India (Bank Nationalisation)

Supreme Court of India · 1970 · AIR 1970 SC 564; (1970) 1 SCC 248

सत्यापन प्रतीक्षित

सरकार द्वारा 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने की पहल को इसलिए निरस्त कर दिया गया क्योंकि शेयरधारकों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति का आकलन अनुचित तरीके से किया गया था और वह विधि उनके व्यवसायिक अधिकारों को अव्यवहारिक रूप से आहत करती थी। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस मामले ने अदालतों के द्वारा सरकारी कार्रवाई की जांच करने के तरीके को बदल दिया—सिर्फ इस पर निर्भर रहने के बजाय कि विधि क्या दावा करती है, अदालतों ने यह देखना शुरू किया कि उसका लोगों के अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ता है। यह तर्क बाद में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का दायरा बढ़ाने की नींव बना, जैसा कि Maneka Gandhi जैसे मामलों में देखा गया।

कहानी

तथ्य

आर.सी. कूपर, जो सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक शेयरधारक और निदेशक थे, ने Banking Companies (Acquisition and Transfer of Undertakings) Act, 1969 को चुनौती दी, जिसने 14 प्रमुख भारतीय बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। उनका तर्क था कि यह अधिनियम शेयरधारकों और बैंकों के संपत्ति के मूल अधिकार तथा व्यवसाय करने के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है, और जो मुआवज़ा निर्धारित किया गया है वह आभासी/छलावा मात्र है। संघ ने राष्ट्रीयकरण का बचाव इस आधार पर किया कि यह अनुच्छेद 31(2) के तहत सार्वजनिक प्रयोजन के लिए विधायी शक्ति का वैध प्रयोग है।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

क्या बैंक राष्ट्रीयकरण अधिनियम ने अनुच्छेद 14, 19(1)(f)/(g) और 31 के तहत शेयरधारकों तथा बैंकिंग कंपनियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया, और क्या किसी विधि की संवैधानिक वैधता का परीक्षण केवल उसके ‘उद्देश्य’ से किया जाना चाहिए या उसके मौलिक अधिकारों पर पड़ने वाले ‘प्रत्यक्ष प्रभाव’ से भी किया जाना चाहिए।

न्यायिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 10:1 के बहुमत से Banking Companies (Acquisition and Transfer of Undertakings) Act, 1969 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट ने माना कि दिए गए मुआवज़े को अनुच्छेद 31(2) के अर्थ में ‘मुआवज़ा’ नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसके निर्धारण के सिद्धांत अप्रासंगिक और मृगतृष्णा-जैसे थे; और यह अधिनियम अनुच्छेद 19(1)(f) तथा 19(1)(g) के तहत शेयरधारकों और बैंकों के अधिकारों पर अवांछनीय तथा अनुचित प्रतिबंध लगाता है। निर्णायक रूप से, कोर्ट ने A.K. Gopalan से निकले संकीर्ण ‘उद्देश्य-परीक्षण’ को अस्वीकार करते हुए यह ठहराया कि राज्य की कार्रवाई की संवैधानिकता का आकलन विधायी उद्देश्य या रूप मात्र से नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों पर उसके प्रत्यक्ष एवं अनिवार्य प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

किसी विधि या कार्यपालिका की कार्रवाई की परीक्षा उसके मूल अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव के आधार पर की जानी चाहिए, केवल उसके घोषित उद्देश्य या जिस विशेष अनुच्छेद के अंतर्गत वह कार्य करने का दावा करती है, उसके आधार पर नहीं; विभिन्न मूल अधिकार परस्पर बहिष्कृत नहीं हैं, बल्कि एक ही तथ्यात्मक परिस्थिति में एक-दूसरे से आच्छादित हो सकते हैं। संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण के लिए दिया जाने वाला मुआवज़ा वास्तविक होना चाहिए, न कि काल्पनिक या अप्रासंगिक सिद्धांतों पर आधारित।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.