Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 31

repealed

संपत्ति का अनिवार्य अर्जन

संपत्ति का अनिवार्य अर्जन ।]-संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 6 द्वारा (20-6-1979 से) निरसित । 3कुछ विधियों की व्यावृत्ति]

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अनुच्छेद 31 मूल अधिकारों के अध्याय का भाग था, जो सुनिश्चित करता था कि निजी संपत्ति को केवल कानून द्वारा और (विभिन्न रूपों में) मुआवज़े के साथ ही राज्य द्वारा लिया जा सकता है। दशकों में यह सरकार के भूमि-सुधार और समाजवादी पुनर्वितरण उद्देश्यों से टकराया, जिससे बार-बार संशोधन (जैसे 1वां, 4वां, 7वां, 25वां और 42वां संशोधन) हुए जिन्होंने संपत्ति-सुरक्षा को कमजोर किया। अंततः 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटा दिया, जो भूमि सुधार, सामाजिक कल्याण कानूनों को प्राथमिकता देने और मुआवज़े की राशि पर न्यायिक पुनरावलोकन घटाने की राजनीतिक-संवैधानिक दिशा को दर्शाता है। इस अधिकार को नए अनुच्छेद 300A के अंतर्गत एक साधारण संवैधानिक/वैधानिक अधिकार बनाया गया, जिसका अर्थ है कि इसे साधारण कानून द्वारा सीमित किया जा सकता है, पर यह अब अनुच्छेद 32 के अधीन सीधे प्रवर्तनीय मूल अधिकार नहीं है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

निरस्तीकरण से पहले, अनुच्छेद 31 भूमि-सुधार और राष्ट्रीयकरण पर बड़े सर्वोच्च न्यायालयी विवादों के केंद्र में था, जैसे जमींदारी उन्मूलन और बैंक राष्ट्रीयकरण के मामलों में, जहाँ न्यायालय यह परखते थे कि मुआवज़ा ‘पर्याप्त’ है या नहीं। संसद और न्यायपालिका के बीच यही तनाव एक मुख्य कारण बना कि संसद ने अनुच्छेद 31 में बार-बार संशोधन किए और अंततः 1978 में इसे हटा दिया। निरस्तीकरण के बाद, न्यायालयों ने संपत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 300A के अंतर्गत एक संवैधानिक अधिकार (मूल अधिकार नहीं) माना है, अर्थात राज्य किसी व्यक्ति को संपत्ति से केवल विधिवत अधिनियमित कानून द्वारा ही वंचित कर सकता है, पर मूल-अधिकार जैसी कड़ी जांच-पड़ताल (जैसे अनुच्छेद 32 के तहत) अब स्वचालित रूप से लागू नहीं होती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि आज भी अनुच्छेद 31 भारत में संपत्ति की रक्षा एक मूल अधिकार के रूप में करता है।

    तथ्य: अनुच्छेद 31 को 1978 में 44वें संशोधन द्वारा पूरी तरह निरस्त कर दिया गया (1979 से प्रभावी); अब संपत्ति का अधिकार केवल अनुच्छेद 300A के तहत एक संवैधानिक/वैधानिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं।

  • मिथक: अनुच्छेद 31 को हटाने का यह अर्थ नहीं है कि सरकार बिना किसी नियम के किसी की भी संपत्ति ले सकती है।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति से वंचित करने के लिए सरकार को फिर भी विधिवत अधिनियमित कानून के अनुसार कार्य करना होगा, यद्यपि अब इसे मूल अधिकार के उल्लंघन के रूप में चुनौती नहीं दी जा सकती।