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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 30

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक-वर्गों का अधिकार

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक-वर्गों का अधिकार-(1) धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा । 1(1क) खंड (1) में निर्दिष्ट किसी अल्पसंख्यक-वर्ग द्वारा स्थापित और प्रशासित शिक्षा संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधि बनाते समय, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अर्जन के लिए ऐसी विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित रकम इतनी हो कि उस खंड के अधीन प्रत्याभूत अधिकार निर्बन्धित या निराकृत न हो जाए ।] (2) शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

संविधान-निर्माताओं ने अनुच्छेद 30 को इसलिए शामिल किया कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों—जिन्होंने विभाजन से पहले और दौरान सांप्रदायिक तनाव देखे थे—को यह आश्वासन मिले कि वे अपने विद्यालयों और महाविद्यालयों का संचालन करके अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म की रक्षा कर सकेंगे, बिना सरकारी अधिग्रहण या भेदभाव के भय के। यह एक व्यापक संवैधानिक प्रतिज्ञा को दर्शाता है कि विविध, बहुलतावादी राष्ट्र में अल्पसंख्यक अस्मिता की रक्षा की जाएगी।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 30 की कई महत्त्वपूर्ण वादों में व्याख्या की है। T.M.A. Pai Foundation v. State of Karnataka (2002) में 11-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अल्पसंख्यकों को संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार है, यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और, विशेषकर सहायता-प्राप्त संस्थानों में, शैक्षिक मानकों को सुनिश्चित करने हेतु युक्तिसंगत विनियमन के अधीन है। P.A. Inamdar v. State of Maharashtra (2005) में न्यायालय ने माना कि बिना सहायता वाले अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रवेश प्रक्रियाओं में अधिक स्वायत्तता है, पर वे पारदर्शिता और योग्यता (मेरिट) के सिद्धांतों की पूरी तरह उपेक्षा नहीं कर सकते। न्यायालयों ने यह भी परखा है कि ‘भाषाई अल्पसंख्यक’ (राज्य-वार निर्धारण) और ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ कौन हैं, और अनुच्छेद 30 का उपयोग उन कानूनों/नियमों को निरस्त करने के लिए किया है जो अल्पसंख्यक प्रबंधन अधिकारों में अनुचित दखल देते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक संस्थानों को सभी सरकारी नियमों से पूर्ण रूप से मुक्त करता है।

    तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक संस्थानों को सुरक्षा, पाठ्यक्रम और मानकों से संबंधित युक्तिसंगत विनियमों का पालन करना होगा, विशेषकर जब उन्हें सरकारी सहायता मिलती है।

  • मिथक: केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को ही अनुच्छेद 30 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।

    तथ्य: यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से धार्मिक और भाषाई—दोनों प्रकार के अल्पसंख्यकों को कवर करता है।

  • मिथक: सरकार कभी भी अल्पसंख्यक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया का विनियमन नहीं कर सकती।

    तथ्य: अदालतों ने, अल्पसंख्यक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए भी, विशेषकर पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वाणिज्यीकरण को रोकने के लिए कुछ विनियमन की अनुमति दी है।