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सं Samvidhan

Amending power & basic structure

I.R. Coelho v. State of Tamil Nadu

Supreme Court of India · 2007 · (2007) 2 SCC 1

सत्यापन प्रतीक्षित

इस मामले से पहले, सरकारें विवादास्पद क़ानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में जोड़कर उन्हें अदालत में चुनौती से निष्क्रिय करने की कोशिश कर सकती थीं। इस निर्णय ने कहा कि वह तरकीब अब पूरी तरह काम नहीं करती: नौवीं अनुसूची के क़ानून भी निरस्त किए जा सकते हैं यदि वे संविधान की आधारभूत संरचना बनाने वाले मूल अधिकारों के मूल तत्त्वों का उल्लंघन करते हैं। इससे न्यायिक पुनरावलोकन को दरकिनार करने के विधायी प्रयासों के विरुद्ध नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा मजबूत हुई। यह सिद्धांत और पक्का हुआ कि कोई भी क़ानून, चाहे उसे किसी भी तरह नाम दिया जाए, अदालतों की मूल अधिकारों की रक्षा करने की शक्ति से बच नहीं सकता।

कहानी

तथ्य

मामला तमिलनाडु के गुडलूर जनम एस्टेट्स (उbolition and Conversion into Ryotwari) अधिनियम से उत्पन्न हुआ, जिसे पहले न्यायालयों ने मूल अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए निरस्त कर दिया था, जिसके बाद राज्य ने उसे न्यायिक पुनरावलोकन से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची में सम्मिलित करवा लिया। याचिकाकर्ताओं ने केसवनंद भारती के बाद की ऐसी नौवीं अनुसूची में की गई प्रविष्टियों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि मूल अधिकारों की जांच को बाहर कर देना आधारभूत संरचना का विनाश करता है। 1973 के केसवनंद भारती निर्णय के बाद अनुच्छेद 31B द्वारा प्रदत्त प्रतिरक्षा के दायरे को प्रामाणिक रूप से स्पष्ट करने के लिए नौ-न्यायाधीशों की पीठ गठित की गई।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

24 अप्रैल 1973 (केसवानंद भारती निर्णय की तिथि) के बाद नवम अनुसूची में जोड़े गए कानून क्या अनुच्छेद 31B के अंतर्गत न्यायिक पुनरावलोकन से पूर्ण प्रतिरक्षा के अधिकारी हैं, या यदि वे आधारभूत संरचना का भाग बनने वाले मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं तो क्या वे अब भी चुनौती के लिए खुले रहते हैं।

न्यायिक निर्णय

नौ-न्यायाधीशीय पीठ ने यह ठहराया कि अनुच्छेद 31B नवम अनुसूची में रखे गए क़ानूनों को समग्र प्रतिरक्षा नहीं देता; ऐसे हर क़ानून, विशेषकर 24 अप्रैल 1973 के बाद जोड़े गए, को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह संविधान की आधारभूत संरचना को क्षति पहुँचाता है या उसे नष्ट करता है, जिसमें अनुच्छेद 14, 19 और 21 जैसे मूल अधिकारों का उन्मूलन भी शामिल है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि अधिकार-परीक्षण और अधिकारों के सार-परीक्षण को नवम अनुसूची के क़ानूनों पर लागू किया जाना चाहिए, और न्यायिक समीक्षा स्वयं जब आधारभूत संरचना का हिस्सा है, तो उसे अपवर्जित नहीं किया जा सकता। 24 अप्रैल 1973 से पहले जिन क़ानूनों को पहले ही वैध ठहराया जा चुका है, उनका अलग-अलग पुनर्परीक्षण आवश्यक नहीं है, परन्तु बाद में जोड़े गए प्रावधानों को आधारभूत संरचना परीक्षण, जिसमें अधिकार-परीक्षण भी शामिल है, पर खरा उतरना होगा।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति, जिसमें नवम् अनुसूची में प्रविष्टियाँ करना भी शामिल है, आधारभूत संरचना सिद्धांत के अधीन है, और जो मूल अधिकार उस आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं, उन्हें केवल किसी विधि को अनुच्छेद 31B के अंतर्गत न्यायिक जांच से परे रखकर समाप्त नहीं किया जा सकता। केशवानंद केशवति के बाद नवम् अनुसूची की विधियों की जाँच उनके मूल अधिकारों और आधारभूत संरचना पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर की जानी चाहिए, न कि केवल इस औपचारिक तथ्य पर कि वे अनुसूची में शामिल कर दी गई हैं।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.