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सं Samvidhan

Religion, dignity & identity

Navtej Singh Johar v. Union of India

Supreme Court of India · 2018 · (2018) 10 SCC 1

सत्यापन प्रतीक्षित

इस निर्णय ने भारत में वयस्कों के बीच सहमति से होने वाले समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, जिससे औपनिवेशिक काल के एक कानून के तहत दशकों से चली आ रही अपराधीकरण की स्थिति समाप्त हुई। इसका अर्थ यह हुआ कि एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों को अब केवल उनकी यौन अभिरुचि या निजी, सहमति-आधारित संबंधों के कारण अभियोजित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह प्रत्यायित किया कि गरिमा, निजता और समानता सभी की हैं, चाहे किसी की यौन अभिरुचि कुछ भी हो, और यह भारत में एलजीबीटीक्यू+ अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। असहमति वाले आचरण तथा नाबालिगों के विरुद्ध अपराध कानून के अंतर्गत यथावत दंडनीय रहे।

कहानी

तथ्य

नवतेज सिंह जौहर, जो एक नृत्यकार हैं, ने एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अन्य सदस्यों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक रिट याचिका दायर की, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई, जो ‘प्रकृति के आदेश के विरुद्ध’ शारीरिक संबंध को अपराध घोषित करती थी। इस प्रावधान का ऐतिहासिक रूप से उपयोग, समान लिंग के वयस्कों के बीच आपसी सहमति से होने वाले यौन कृत्यों को अपराधीकरण करने के लिए किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धारा 377 समानता, गरिमा, निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। यह मामला न्यायालय के 2014 के NALSA निर्णय (ट्रांसजेंडर अधिकारों पर) और 2017 के Puttaswamy निर्णय (निजता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने वाला) के बाद आया, जिन दोनों ने 2013 में धारा 377 को बरकरार रखने वाले पहले के Suresh Kumar Koushal निर्णय पर पुनर्विचार के लिए संवैधानिक आधार को सुदृढ़ किया।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377, जो समान लिंग के वयस्कों के बीच आपसी सहमति से होने वाले यौन कृत्यों को अपराध घोषित करती है, संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मूल अधिकार (अनुच्छेद 14), भेदभाव-निषेध (अनुच्छेद 15), जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता सहित गरिमा तथा निजता (अनुच्छेद 21), तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) का उल्लंघन करती है?

न्यायिक निर्णय

पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह ठहराया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377, जिस हद तक वह निजी क्षेत्र में समान लिंग के वयस्कों के बीच सहमति-आधारित यौन आचरण को अपराध घोषित करती थी, असंवैधानिक है और संविधान के Article 14, Article 15, Article 19 तथा Article 21 का उल्लंघन करती है। न्यायालय ने Suresh Kumar Koushal v. Naz Foundation (2013) में दिए अपने पूर्व निर्णय को पलटते हुए कहा कि यौन अभिविन्यास आत्म-परिचय का अंतर्निहित हिस्सा है, और उसे नकारना निजता तथा गरिमा के अधिकार का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने धारा 377 की व्याख्या सीमित करते हुए वयस्कों के बीच सहमति-आधारित समलैंगिक कृत्यों को अपराध-मुक्त कर दिया, जबकि इसे असहमति-आधारित कृत्यों, पशुगमन और नाबालिगों से संबंधित कृत्यों के लिए यथावत बनाए रखा।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

संवैधानिक नैतिकता, न कि बहुसंख्यकवादी जन-नैतिकता, उन क़ानूनों की न्यायिक समीक्षा का मार्गदर्शन करनी चाहिए जो मूल अधिकारों का हनन करते हैं; वयस्कों के बीच निजी, सहमति-आधारित आचरण को लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर अपराधी ठहराने वाला क़ानून, अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अंतर्गत गरिमा, स्वायत्तता और समानता का उल्लंघन करता है। लैंगिक अभिविन्यास एक अंतर्निहित और अपरिवर्तनीय विशेषता है, जो अनुच्छेद 15 के अंतर्गत ‘लिंग’ के समान उपमान्य (analogous) आधार के रूप में भेदभाव से संरक्षित है।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.