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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 215

Prosecution for contempt of lawful authority of public servants, for offences against public

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान 1898 के दंड प्रक्रिया संहिता से, और बाद में दंप्रसं (CrPC), 1973 की धारा 195 से चली आ रही व्यवस्था को जारी रखता है। उद्देश्य यह है कि निजी व्यक्ति लोक सेवकों के विरुद्ध उनके आधिकारिक कृत्यों पर प्रताड़ना/उत्पीड़क (vexatious) प्रकार के अभियोग न छेड़ सकें, और हर छोटे-मोटे अदालती विवाद पर लोग कपटसाक्ष्य या जालसाजी की शिकायतें दायर न कर दें। इसके बजाय अभियोजन का निर्णय स्वयं लोक सेवक या न्यायालय पर छोड़ दिया जाता है, जो बेहतर स्थिति में होते हैं यह आकलन करने के लिए कि मामला सच में आपराधिक कार्यवाही के योग्य है या नहीं। इससे अधिकारियों और न्यायिक प्रक्रिया को निजी वैमनस्य के औज़ार के रूप में दुरुपयोग से संरक्षण मिलता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 195 दंप्रसं) के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में इसके दायरे को स्पष्ट किया। Sachida Nand Singh v. State of Bihar (1998) में कहा गया कि जालसाजी-संबंधी अपराधों पर अभियोजन की रोक तभी लागू होती है जब जालसाजी या गढ़ावट उस समय हुई हो जब दस्तावेज़ न्यायालय में प्रस्तुत हो चुका हो; न कि तब, जब जालसाजी उस दस्तावेज़ के कार्यवाही में आने से पहले हुई हो। पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने Iqbal Singh Marwah v. Meenakshi Marwah (2005) में इसे पुष्ट और विस्तृत करते हुए कहा कि यदि किसी जाली दस्तावेज़ का निर्माण न्यायालय में दायर किए जाने से पहले हुआ था, तो स्वतंत्र निजी शिकायत बनाए रखी जा सकती है, क्योंकि अपराध स्वयं ‘न्यायालयीय कार्यवाही के संबंध में’ नहीं हुआ। न्यायालयों ने लगातार इस प्रावधान की संकीर्ण व्याख्या की है ताकि लोक सेवक या वादकारी इसे वैध शिकायतों के विरुद्ध ढाल की तरह न इस्तेमाल कर सकें।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: जो कोई भी लोक सेवक की अवज्ञा होते या अदालत में झूठ बोला जाता देखे, वह स्वयं आपराधिक शिकायत दायर कर सकता है।

    तथ्य: यह धारा विशेष रूप से इन अपराधों में निजी शिकायतों पर न्यायालय को कार्यवाही करने से रोकती है — केवल संबंधित लोक सेवक, उसका उच्चाधिकारी, कोई अधिकृत अधिकारी, या स्वयं न्यायालय शिकायत दायर कर सकते हैं।

  • मिथक: यह प्रावधान लोक सेवकों और न्यायालयों को कहीं भी होने वाली हर प्रकार की जालसाजी-संबंधी शिकायतों से बचाव देता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है (पहले के समान प्रावधान, धारा 195 दंप्रसं की व्याख्या वाले मामलों में) कि यह रोक तभी लागू होती है जब अपराध — जैसे जालसाजी — ऐसे दस्तावेज़ के संबंध में हो जो पहले ही न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका हो; न कि उस जालसाजी पर जो दस्तावेज़ के कार्यवाही में आने से पहले की गई हो।