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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 211

Transfer on application of accused

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान इस सिद्धांत की रक्षा करता है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। जब कोई मजिस्ट्रेट औपचारिक शिकायत या पुलिस जांच के बजाय केवल अपनी जानकारी या संदेह के आधार पर मामला प्रारंभ करता है, तो वही व्यक्ति आरंभकर्ता और विचारण न्यायाधीश—दोनों होने से पक्षपात का वास्तविक या प्रतीत होने वाला जोखिम उत्पन्न होता है। कानून इसका समाधान यह अवसर देकर करता है कि अभियुक्त का मामला किसी निष्पक्ष, असंबद्ध मजिस्ट्रेट द्वारा सुना जाए, जिससे निष्पक्ष विचारण में जन-विश्वास बना रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की पूर्ववर्ती, समान शब्दों वाली धारा 191 के तहत, न्यायालयों ने माना है कि इस अधिकार की सूचना देना विवेकाधीन नहीं, बल्कि अनिवार्य है; और साक्ष्य दर्ज होने से पहले ऐसा न करना पूरे विचारण को दूषित कर सकता है। न्यायालयों ने इसे प्राकृतिक न्याय में निहित एक सुरक्षा-कवच माना है, जो सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त की आपत्ति सुनी जाए और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा नामित किसी अन्य मजिस्ट्रेट को मामला स्थानांतरित कर दी जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह नियम हर उस आपराधिक मामले पर लागू होता है जिसमें कोई मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है।

    तथ्य: यह केवल उन्हीं मामलों पर लागू होता है जहाँ मजिस्ट्रेट धारा 210(1)(c) के तहत, यानी अपनी जानकारी या संदेह के आधार पर, संज्ञान लेते हैं; शिकायत या पुलिस रिपोर्ट से शुरू हुए मामलों पर नहीं।

  • मिथक: अभियुक्त की आपत्ति मात्र एक सुझाव है जिसे मजिस्ट्रेट अनदेखा कर सकता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने अभियुक्त को इस अधिकार की सूचना देने और उसकी वैध आपत्ति का सम्मान करने को विवेकाधीन औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा-कवच माना है।