Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 210
Cognizance of offences by Magistrate
(1) Subject to the provisions of this Chapter, any Magistrate of the first class, and any Magistrate of the second class specially empowered in this behalf under sub-section (2), may take cognizance of any offence—
(a) upon receiving a complaint of facts, including any complaint filed by a person authorised under any special law, which constitutes such offence;
(b) upon a police report (submitted in any mode including electronic mode) of such facts;
(c) upon information received from any person other than a police officer, or upon his own knowledge, that such offence has been committed.
(2) The Chief Judicial Magistrate may empower any Magistrate of the second class to take cognizance under sub-section (1) of such offences as are within his competence to inquire into or try.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 में पहले से निहित नियम को आगे बढ़ाता है। इसका उद्देश्य वह सटीक क्षण और तरीका निर्धारित करना है जब कोई मजिस्ट्रेट किसी आपराधिक विषय पर विधिक रूप से अधिकार ग्रहण करता है — जो किसी भी जाँच, समन या विचारण से पहले की निर्णायक प्रथम सीढ़ी है। तीन अलग-अलग मार्गों (निजी शिकायत, पुलिस प्रतिवेदन, या अन्य सूचना/व्यक्तिगत जानकारी) की सूची देकर, यह सुनिश्चित करता है कि न्याय पुलिस के सक्रिय होने पर ही निर्भर न रहे, फिर भी प्रक्रिया न्यायिक अधिकारी के मनन-चिंतन से बँधी रहे। बीएनएसएस अद्यतन पुलिस प्रतिवेदनों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में स्वीकार्य बनाता है, जिससे प्रक्रिया का आधुनिकीकरण होता है, और यह भी स्पष्ट करता है कि विशेष क़ानूनों द्वारा अधिकृत शिकायतकर्ता (जैसे कर या पर्यावरण संबंधी विधियों के अधिकारी) भी सीधे मजिस्ट्रेट के पास आ सकते हैं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पुराने समान प्रावधान (धारा 190 CrPC) के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा कि ‘संज्ञान लेना’ का अर्थ समन जारी करना या औपचारिक विचारण शुरू करना नहीं है — इसका अर्थ है कि मजिस्ट्रेट आगे बढ़ने के उद्देश्य से कथित अपराध के संबंध में अपने न्यायिक मन को लागू करता है (देखें R.R. Chari v. State of U.P.; तथा बाद में Devarapalli Lakshminarayana Reddy v. Narayana Reddy जैसे प्रकरणों में इसका और परिष्कार)। न्यायालयों ने यह भी माना है कि संज्ञान अपराध का लिया जाता है, न कि आरोपी व्यक्ति का; और मात्र शिकायत या प्रतिवेदन का प्राप्त होना अपने-आप संज्ञान माने जाने के लिए पर्याप्त नहीं — न्यायिक मनन अनिवार्य है। चूँकि भाषा काफी हद तक यथावत रखी गई है, ये सिद्धांत धारा 210 बीएनएसएस की व्याख्या का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि आपराधिक मामला केवल तब शुरू हो सकता है जब पुलिस प्रतिवेदन (चार्जशीट) दाखिल करे।
तथ्य: धारा 210 स्पष्ट रूप से यह अनुमति देती है कि मजिस्ट्रेट बिना किसी पुलिस प्रतिवेदन के भी सीधे निजी शिकायत या अन्य सूचना से संज्ञान ले सकते हैं।
मिथक: ‘संज्ञान लेना’ का अर्थ यह नहीं है कि विचारण शुरू हो गया।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि संज्ञान लेना केवल इतना दर्शाता है कि मजिस्ट्रेट ने आगे बढ़ने के लिए अपने मन को लागू किया है — यह एक प्रारम्भिक प्रक्रियात्मक कदम है, न कि स्वयं विचारण।
मिथक: यह कथन गलत है कि इस धारा के अंतर्गत केवल कागज़ी पुलिस प्रतिवेदन ही मान्य हैं।
तथ्य: बीएनएसएस स्पष्ट रूप से यह भी मान्यता देता है कि पुलिस प्रतिवेदन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं।