Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 208
Offence committed outside India
When an offence is committed outside India—
(a) by a citizen of India, whether on the high seas or elsewhere; or
(b) by a person, not being such citizen, on any ship or aircraft registered in India, he may be dealt with in respect of such offence as if it had been committed at any place within India at which he may be found or where the offence is registered in India: Provided that notwithstanding anything in any of the preceding sections of this Chapter, no such offence shall be inquired into or tried in India except with the previous sanction of the Central Government.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 188 के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है। सामान्यतः राज्य अन्य देशों की भूमि पर होने वाली घटनाओं की पुलिसिंग नहीं कर सकते, परन्तु अंतरराष्ट्रीय क़ानून दो अपवाद मानता है: कोई देश अपने नागरिकों पर जहां भी वे जाएँ अधिकार-क्षेत्र लागू कर सकता है (‘राष्ट्रीयता सिद्धांत’), और अपने ध्वज वाले जलयान व विमान पर (‘ध्वज-राज्य सिद्धांत’)। भारत ने दोनों को अपनाया। विदेश में किए गए कृत्यों पर अभियोजन से कूटनीतिक संबंध, विदेशी साक्ष्य-संग्रह और संधि-कर्तव्यों पर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले जाँच-पड़ताल के लिए कार्यपालिका को छँटाई की भूमिका देने हेतु केंद्र सरकार से पूर्व अनुमोदन की शर्त एक सुरक्षा उपाय के रूप में जोड़ी गई।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 188 दंप्रसं) को प्रक्रिया के मामले में संकीर्ण, पर अधिकार-क्षेत्र के मामले में व्यापक रूप से पढ़ा है। Central Bank of India Ltd. v. Ram Narain (1954) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि नागरिकता का आकलन अपराध किए जाने के समय की स्थिति के आधार पर होगा, न कि सुनवाई के समय। Om Hemrajani v. State of U.P. (2005) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस बिना पूर्व अनुमोदन के भी विदेश में किए गए अपराध की जाँच कर सकती है और आरोप-पत्र दाखिल कर सकती है, परन्तु न्यायालय द्वारा वास्तविक जाँच या मुक़दमे की शुरुआत केंद्र सरकार के अनुमोदन के बाद ही हो सकती है—यह अनुमोदन उस चरण तक किसी भी समय दिया जा सकता है जब तक न्यायालय गुण-दोष पर विचार प्रारम्भ न करे। न्यायालयों ने अनुमोदन की इस शर्त को अनिवार्य माना है, मात्र औपचारिकता नहीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि भारतीय न्यायालय किसी भी भारतीय नागरिक के विदेश में किए अपराध का अपने आप मुक़दमा चला सकते हैं।
तथ्य: पुलिस की जाँच पहले शुरू हो सकती है, पर केंद्र सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना न्यायालय वास्तविक मुक़दमा शुरू नहीं कर सकता।
मिथक: यह नियम केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू नहीं होता।
तथ्य: यदि अपराध किसी भारतीय पंजीकरण वाले जहाज़ या विमान पर हुआ हो, तो यह गैर-नागरिकों पर भी लागू होता है।
मिथक: यह गलत है कि नागरिकता उस समय की स्थिति से तय होगी जब व्यक्ति पकड़ा जाए या उस पर मुक़दमा चले।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि नागरिकता का निर्धारण उसी समय की स्थिति से होगा जब अपराध वास्तव में किया गया था।