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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 217

Prosecution for offences against State and for criminal conspiracy to commit such

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 में निहित एक दीर्घकालीन सुरक्षा को आगे बढ़ाता है, जिसे CrPC, 1973 की धारा 196 में कायम रखा गया था। जिन अपराधों का यह उल्लेख करता है—राज्य के विरुद्ध देशद्रोह‑सदृश कृत्य, साम्प्रदायिक घृणा को बढ़ावा देना, धार्मिक भावनाएँ आहत करना, या भड़काऊ सार्वजनिक बयान देना—वे राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील हैं। विधि‑निर्माताओं को चिंता थी कि निजी व्यक्ति या अति‑उत्साही पुलिस इन धाराओं का दुरुपयोग कर राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों या अल्पसंख्यक समूहों को प्रताड़ित कर सकते हैं। पहले से सरकार या जिला मजिस्ट्रेट की स्वीकृति अनिवार्य करने से एक छननी का काम होता है: अदालत के शामिल होने से पहले एक स्वतंत्र प्राधिकारी यह जाँचता है कि अभियोजन सच में उचित है या नहीं, जिससे निरर्थक या दुर्भावनापूर्ण मामलों का जोखिम घटता है, जबकि लोक‑व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के वास्तविक खतरों पर अभियोजन संभव रहता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 196, CrPC 1973) के अधीन, न्यायालयों ने निरंतर माना कि स्वीकृति का होना अधिकार‑क्षेत्र के लिए अनिवार्य पूर्वशर्त है—इसके बिना अदालत द्वारा लिया गया संज्ञान शून्य होता है, और यह त्रुटि किसी भी चरण पर, यहाँ तक कि अपील में भी, उठाई जा सकती है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वीकृति वास्तविक मनोनिवेश के साथ, स्वतंत्र विचार के आधार पर होनी चाहिए—सिर्फ औपचारिक मुहर नहीं—और यह आवश्यकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करती है, ताकि धर्म, साम्प्रदायिक सद्भाव और राज्य सुरक्षा से जुड़े अपराधों में आवेगपूर्ण अभियोजन न हो। चूंकि BNSS नया है, न्यायालयों से अपेक्षा है कि वे धारा 217 पर भी इसी स्थापित तर्कश्रेणी को तुलनात्मक रूप से लागू करेंगे, यद्यपि इस धारा की विशिष्ट व्याख्या करने वाले BNSS के निर्णय अभी उपलब्ध नहीं हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने (धारा 196) या धार्मिक भावनाएँ आहत करने (धारा 299) जैसे अपराधों में केवल एफआईआर दर्ज करने के बाद तुरंत अभियोजन चला सकती है।

    तथ्य: धारा 217 के तहत, केंद्र या राज्य सरकार द्वारा पूर्व स्वीकृति दिए बिना अदालत इन अपराधों का संज्ञान तक नहीं ले सकती।

  • मिथक: सभी आपराधिक साज़िशों के अभियोजन से पहले सरकारी स्वीकृति या सहमति आवश्यक है।

    तथ्य: केवल विशेष गंभीर अपराधों (जैसे उपधारा (1) और (2) में वर्णित) से जुड़ी साज़िशों पर स्वीकृति चाहिए; धारा 61(2) के अंतर्गत कम गंभीर साज़िशों के लिए केवल राज्य/जिला मजिस्ट्रेट की सहमति पर्याप्त है, और यदि साज़िश धारा 215 के अधीन अपराध से संबंधित हो तो वह सहमति भी आवश्यक नहीं।

  • मिथक: स्वीकृति महज़ औपचारिकता है जिसे सरकारें स्वतः ही हमेशा दे देती हैं।

    तथ्य: न्यायालयों ने (पूर्ववर्ती, समान शब्दावली वाले CrPC प्रावधान के अंतर्गत) माना है कि स्वीकृति प्राधिकारी द्वारा वास्तविक, स्वतंत्र विचार‑विमर्श को दर्शानी चाहिए, न कि महज़ मुहर लगाने जैसा अनुमोदन।