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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 174

Information as to non-cognizable cases and investigation of such cases

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था (मूलतः दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 155, जो 1898 की संहिता से विकसित हुई) को आगे बढ़ाता है, जो अपराधों को ‘संहारी’ (गम्भीर, जिनमें पुलिस तत्काल गिरफ़्तारी व जाँच कर सकती है) और ‘असंहारी’ (कम गम्भीर, जिनमें पुलिस कार्रवाई से पहले न्यायिक पर्यवेक्षण आवश्यक) में बाँटती है। उद्देश्य यह है कि सामान्य चोट, मानहानि या लोक उपद्रव जैसे छोटे-छोटे विवादों में पुलिस के अतिक्रमण को रोका जाए — जाँच शुरू करने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य करके — जबकि हर शिकायत का अभिलेख भी रखा जाए, ताकि कुछ भी छूटे या अनदेखा न हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती धारा 155 दंप्रसं के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार माना कि मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना केवल असंहारी अपराध में पुलिस जाँच अवैध है, और ऐसी अनधिकृत जाँच से प्राप्त साक्ष्य को अपवर्जित किया जा सकता है या सावधानी से परखा जा सकता है, यद्यपि इससे स्वतः मुकदमे की वैधता नष्ट नहीं होती। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया कि जब एक ही प्राथमिकी में संहारी और असंहारी दोनों प्रकार के अपराध प्रकट हों, तो एक भी संहारी अपराध की उपस्थिति पुलिस को पूरे प्रकरण की स्वतंत्र रूप से जाँच की अनुमति देती है (यह सिद्धांत अब उपधारा (4) के रूप में संहिताबद्ध है)। नवसंख्यायित BNSS के इस प्रावधान की उच्चतम न्यायालय द्वारा विशेष व्याख्या अभी नहीं हुई है, क्योंकि यह विद्यमान विधि का ही पुनर्वचन है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस असंहारी अपराध की शिकायत दर्ज करने से भी इनकार कर सकती है।

    तथ्य: क़ानून के अनुसार, अपराध संहारी हो या असंहारी, पुलिस को स्टेशन डायरी में शिकायत अवश्य दर्ज करनी है; सिर्फ़ असंहारी मामलों में वे मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जाँच नहीं कर सकते।

  • मिथक: मजिस्ट्रेट द्वारा असंहारी मामले में जाँच की अनुमति मिलते ही पुलिस को बिना वारंट गिरफ़्तारी सहित सभी शक्तियाँ मिल जाती हैं।

    तथ्य: मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद भी, क़ानून विशेष रूप से पुलिस को ऐसे मामलों में बिना वारंट गिरफ़्तारी की शक्ति नहीं देता।