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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 197

Ordinary place of inquiry and trial

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

ऐसे प्रादेशिक अधिकार-क्षेत्र के नियम भारत के शुरुआती दंड प्रक्रिया संहिताओं से चले आ रहे हैं (Code of Criminal Procedure, 1898 से शुरू होकर 1973 में आगे बढ़े)। विचार व्यावहारिक है: सबूत, गवाह, थाना और घटनास्थल के बारे में स्थानीय जानकारी—ये सब आम तौर पर वहीं मिलते हैं जहाँ अपराध हुआ। वहीँ मुकदमा चलाने से खर्च कम होता है, गवाहों की दिक्कत घटती है और प्रक्रिया सुगम रहती है। ‘सामान्यतः’ शब्द बताता है कि यह मूल (डिफ़ॉल्ट) नियम है, कोई पूर्ण अपवादहीन बाध्यता नहीं—आगे की धाराएँ बहु-स्थलीय अपराध, निरंतर अपराध, या आंशिक रूप से क्षेत्र के बाहर किए गए अपराधों के लिए अपवाद देती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने लंबे समय से पूर्ववर्ती प्रावधान (CrPC, 1973 की धारा 177) को सख्त अधिकार-क्षेत्रीय निषेध के बजाय सुविधा का नियम माना है। Purushottam Dass Dalmia v. State of West Bengal में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि अपराध निरंतर प्रकृति का हो या उसके घटक कई स्थानों पर हों, तो एक से अधिक अदालतों का अधिकार-क्षेत्र हो सकता है। Y. Abraham Ajith v. Inspector of Police में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिकार-क्षेत्र इस पर निर्भर करता है कि अपराध के वास्तविक अवयव कहाँ घटित हुए, न कि केवल वहाँ जहाँ शिकायत दायर की गई। नई संहिता में ‘स्थानीय अधिकार-क्षेत्र’ को समझने में ये व्याख्याएँ अब भी मार्गदर्शक हैं, क्योंकि धारा 197 की भाषा पहले के प्रावधान से काफ़ी मेल खाती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि मामला केवल और केवल वहीं चल सकता है जहाँ अपराध हुआ, और कोई अपवाद नहीं हैं।

    तथ्य: ‘सामान्यतः’ का अर्थ है कि यह मूल (डिफ़ॉल्ट) नियम है। संहिता की आगे की धाराएँ बहु-स्थानों पर हुए अपराध, निरंतर अपराध, या कुछ विशेष परिस्थितियों में अन्यत्र सुनवाई की अनुमति देती हैं।

  • मिथक: पीड़ित या शिकायतकर्ता अपनी व्यक्तिगत सुविधा के आधार पर यह नहीं चुन सकता कि मामला किस अदालत में सुना जाएगा।

    तथ्य: अदालतों ने माना है कि अधिकार-क्षेत्र इस पर निर्भर करता है कि अपराध के आवश्यक तथ्य कहाँ घटित हुए, न कि जहाँ शिकायतकर्ता या कोई गवाह रहता है।