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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 198

Place of inquiry or trial

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अपराध हमेशा किसी एक थाने की हद में सलीके से नहीं होते। अपहरण, धोखाधड़ी, साइबर अपराध, या लगातार होने वाली अशांति जैसे मामलों में कई कस्बे या ज़िले शामिल हो सकते हैं। यह प्रावधान (पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 179–182 की रूपरेखा को आगे बढ़ाते हुए, अब एकीकृत रूप में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में) ‘गलत क्षेत्राधिकार’ जैसी तकनीकी आपत्ति पर मामलों के ध्वस्त होने से रोकता है और पीड़ितों व पुलिस को यह व्यावहारिक, समझदारीभरा विकल्प देता है कि मामला कहाँ दर्ज और संचालित किया जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती, समान भाषा वाले CrPC प्रावधानों के तहत, न्यायालयों ने लगातार माना कि क्षेत्राधिकार के ये नियम व्यावहारिक हैं, अतितकनीकी नहीं — उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई सक्षम अदालत अपराध की सुनवाई कर सके; और विचार‑अधिकार (मुकदमे के स्थान) पर आपत्तियाँ प्रारंभ में ही उठाई जानी चाहिए और वास्तविक पूर्वाग्रह सिद्ध होना चाहिए, न कि अति‑तकनीकी आधारों पर मामलों को पटरी से उतारने के लिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि कई संभावित शहरों में से ‘गलत’ शहर में मुकदमा चला तो मामला अवैध है।

    तथ्य: कानून यह अनुमति देता है कि जुड़े हुए स्थानीय क्षेत्रों में से किसी भी क्षेत्र की अदालत में वैध रूप से मुकदमा चल सकता है — जब अपराध कई क्षेत्रों में फैला हो तब कोई एक अनिवार्य स्थान तय नहीं है।

  • मिथक: इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में कहीं भी कोई भी अदालत कोई भी मामला चला सकती है।

    तथ्य: चयन उन्हीं अदालतों तक सीमित है जिनका अधिकार‑क्षेत्र उन विशिष्ट स्थानीय क्षेत्रों पर है जो वास्तव में अपराध से जुड़े हैं; किसी भी मनमाने स्थान की अदालत नहीं।