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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 125

Security for keeping peace on conviction

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दण्ड प्रक्रिया में लम्बे समय से चली आ रही प्रतिषेधात्मक न्याय (प्रिवेन्टिव जस्टिस) की परंपरा को आगे बढ़ाता है (पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 106 में निहित)। विचार यह है कि केवल दंड देने से रिहाई के बाद व्यक्ति द्वारा पुनः उपद्रव रोकना हमेशा संभव नहीं होता; शांति बनाए रखने का बंधपत्र दिलवाना न्यायालयों को दोहराए जाने वाले हिंसा, भयादोहन या दंगा-प्रकार के आचरण को हतोत्साहित करने का साधन देता है, ताकि व्यक्ति के फिर से अनुचित व्यवहार करने पर नया फौजदारी मुकदमा दायर किए बिना भी कार्रवाई संभव हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 106 दंप्रसं) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार यह माना कि शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा का आदेश देना विवेकाधीन है तथा तभी दिया जाना चाहिए जब न्यायाधीश वास्तविक रूप से संतुष्ट हो कि दोषी फिर से शांति भंग कर सकता है; यह हर दोषसिद्धि के साथ यांत्रिक रूप से जोड़ने वाली चीज नहीं है। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि बंधपत्र की अवधि वैधानिक अधिकतम से अधिक नहीं हो सकती, और यदि मूल दोषसिद्धि अपील या पुनरीक्षण में हट जाती है, तो बंधपत्र स्वतः खत्म हो जाता है, क्योंकि उसका विधिक बल पूरी तरह उसी दोषसिद्धि से उपजता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: शांति-बंधपत्र हर दोषसिद्धि में स्वतः दी जाने वाली सजा है।

    तथ्य: न्यायालयों को विशेष रूप से यह विश्वास होना चाहिए कि यह ‘आवश्यक’ है; शांति-बंधपत्र स्वतः नहीं दिया जाता और केवल कुछ सूचीबद्ध अपराधों में ही लागू होता है।

  • मिथक: शांति-बंधपत्र उतनी ही अवधि तक रहता है जितनी देर न्यायाधीश चाहें।

    तथ्य: कानून बंधपत्र की अवधि का अधिकतम सीमा तीन वर्ष तय करता है।

  • मिथक: केवल मजिस्ट्रेट ही ऐसा आदेश दे सकता है।

    तथ्य: सत्र न्यायालय, अपीलीय न्यायालय, और पुनरीक्षणाधिकार का प्रयोग करने वाले न्यायालय भी यह आदेश दे सकते हैं; केवल प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट तक यह सीमित नहीं है।