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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 126

Security for keeping peace in other cases

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय आपराधिक प्रक्रिया की एक दीर्घकालीन विशेषता को आगे बढ़ाता है (पहले दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 107, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल की प्रतिषेधात्मक न्याय व्यवस्था में हैं), जो दंडाधिकारियों को केवल अपराध के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले भी हस्तक्षेप करने देती है। उद्देश्य यह है कि स्थानीय प्राधिकारी विवाद, रंजिश, धमकियों जैसी तनावपूर्ण स्थितियों को हिंसा में बदलने से पहले ही उस व्यक्ति से सद्व्यवहार का औपचारिक वचन लेकर शान्त करें जिसे जोखिम माना जा रहा है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः रेखांकित किया है कि यह अधिकार दंडात्मक नहीं, प्रतिषेधात्मक है—इसे सावधानी से और तभी प्रयोग किया जाना चाहिए जब शांति भंग की संभावना दर्शाने वाली वास्तविक, विशिष्ट सामग्री हो; केवल अस्पष्ट शंका या अफ़वाह पर्याप्त नहीं। न्यायाधीशों ने ज़ोर दिया है कि दंडाधिकारी को कार्यवाही से पहले ‘पर्याप्त आधार’ दर्शाते हुए स्पष्ट कारण अंकित करने चाहिए, और इस प्रक्रिया का उपयोग किसी को परोक्ष रूप से दंडित करने या निजी वैमनस्य निपटाने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा पहले से किए गए अपराध के लिए किसी को दंडित करने हेतु नहीं है।

    तथ्य: यह एक प्रतिषेधात्मक उपाय है, जिसका उद्देश्य संभावित भविष्य के शांति-भंग को रोकना है—यह बीते हुए अपराध के लिए दंड नहीं है।

  • मिथक: यह कानून स्थान की परवाह किए बिना किसी भी दंडाधिकारी को कहीं भी कार्रवाई करने देता है—यह कथन गलत है।

    तथ्य: केवल वही कार्यपालक दंडाधिकारी, जिसके पास उस स्थान का क्षेत्राधिकार है जहाँ उपद्रव की आशंका है, या जहाँ संदिग्ध व्यक्ति मौजूद है, ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है।