Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 130

Order to be made

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध एक पुराने सुरक्षात्मक प्रावधान की निरंतरता है (जो पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 111 में था) जिसका उद्देश्य मनमाने या अस्पष्ट, निरोधात्मक-हिरासत जैसे आदेशों को रोकना है। धाराएँ 126 से 129 मजिस्ट्रेट को ऐसे व्यक्तियों से बंध-पत्र लेने की शक्ति देती हैं जिनके बारे में आशंका हो कि वे शांति भंग करेंगे, बार-बार अपराध करेंगे, या कुछ अवांछनीय आचरण करेंगे। चूँकि ऐसे आदेश बिना पूर्ण मुकदमे के भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाते हैं, कानून मजिस्ट्रेट से अपेक्षा करता है कि वह अपने कारणों और शर्तों को स्पष्ट व विशिष्ट रूप से लिखित में दर्ज करे—ताकि पारदर्शिता बनी रहे, व्यक्ति को उचित सूचना मिले, और भविष्य में अपील के लिए अभिलेख उपलब्ध रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने, समान पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 111 CrPC) की व्याख्या करते हुए, लगातार माना है कि लिखित आदेश केवल औपचारिकता नहीं है। उसमें आशंका के आधार का वास्तविक सामग्री या विशिष्ट तथ्य प्रकट होना चाहिए, न कि धुँधले या सामान्य आरोप; क्योंकि व्यक्ति को ठीक-ठीक जानना चाहिए कि उसे किस मामले का सामना करना है। उच्च न्यायालयों ने ऐसे आदेश निरस्त किए हैं जो केवल वैधानिक भाषा दोहराते हैं पर वास्तविक तथ्यों को नहीं बताते, और इसे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राकृतिक न्याय का आवश्यक अंग माना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: मजिस्ट्रेट बिना कोई लिखित कारण बताए, केवल मौखिक रूप से बंध-पत्र जमा करने का आदेश दे सकता है।

    तथ्य: कानून स्पष्ट तथ्यों, बंध-पत्र की राशि, अवधि और जमानतदारों की संख्या का उल्लेख करते हुए लिखित आदेश की माँग करता है—अदालतों ने ऐसे आदेश रद्द किए हैं जिनमें ये ठोस बातें छोड़ दी गई हों।

  • मिथक: किसी भी व्यक्ति को बिना जाँच-पड़ताल के जमानतदार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

    तथ्य: आदेश अंतिम करने से पहले मजिस्ट्रेट को विशेष रूप से यह विचार करना चाहिए कि प्रस्तावित जमानतदार पर्याप्त तथा उपयुक्त (विश्वसनीय) हैं या नहीं।