Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 136
Order to give security
If, upon such inquiry, it is proved that it is necessary for keeping the peace or maintaining good behaviour, as the case may be, that the person in respect of whom the inquiry is made should execute a bond or bail bond, the Magistrate shall make an order accordingly: Provided that—
(a) no person shall be ordered to give security of a nature different from, or of an amount larger than, or for a period longer than, that specified in the order made under section 130;
(b) the amount of every bond or bail bond shall be fixed with due regard to the circumstances of the case and shall not be excessive;
(c) when the person in respect of whom the inquiry is made is a child, the bond shall be executed only by his sureties.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारत की दीर्घकालिक ‘निवारक न्याय’ (preventive justice) व्यवस्था का ही विस्तार है, जो औपनिवेशिक काल के दण्ड प्रक्रिया संहिता से विरासत में मिली थी (मूलतः 106‑124 जैसी धाराएँ, बाद में CrPC की Section 118), जिसके तहत अदालतें उन व्यक्तियों को, जिनसे सार्वजनिक शांति भंग होने या दुष्कृत्य दोहराने की आशंका हो, वास्तविक अपराध की प्रतीक्षा किए बिना, बंधपत्र में बाध्य कर सकती थीं। यहाँ दिए गए सुरक्षा उपाय (पहले के नोटिस से मेल, राशि को उचित रखना, बच्चों की रक्षा) इसलिए जोड़े गए थे ताकि मजिस्ट्रेट इस निवारक शक्ति का मनमाना या दंडात्मक उपयोग न करें, क्योंकि यह किसी अपराध से पहले ही व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
एक जैसे शब्दों वाले पूर्ववर्ती प्रावधान CrPC की Section 118 के तहत, न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग करना चाहिए और वे प्रारम्भिक आदेश में प्रस्तावित सुरक्षा से अधिक कठोर सुरक्षा नहीं थोप सकते; साथ ही राशि को व्यक्ति की आर्थिक क्षमता और वास्तविक जोखिम से जोड़ा जाना चाहिए, उसे अत्यधिक या दंडात्मक उपाय के रूप में नहीं बरता जा सकता। न्यायिक मार्गदर्शन ने ऐसे निवारक‑नजरबंदी‑शैली (preventive detention) के अधिकारों को सावधान और समुपयुक्त उपयोग योग्य माना है, क्योंकि वे अग्रिम रूप से स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: मजिस्ट्रेट जाँच के बाद, यदि उन्हें व्यक्ति खतरनाक लगे, तो बंधपत्र की राशि बढ़ा सकते हैं या उसकी अवधि बढ़ा सकते हैं।
तथ्य: कानून इसे स्पष्ट रूप से निषिद्ध करता है — अंतिम बंधपत्र की प्रकृति, राशि या अवधि Section 130 के तहत पहले दिए गए आदेश में निर्दिष्ट दायरे से अधिक नहीं हो सकती।
मिथक: इस प्रक्रिया में आरोपित किसी बालक को वयस्क की तरह स्वयं बंधपत्र पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है।
तथ्य: कानून यह आवश्यक करता है कि केवल बालक के जमानतदार ही बंधपत्र निष्पादित करें, बालक स्वयं नहीं।