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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 455

Postponement of execution of sentence of death in case of appeal to Supreme

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

मृत्युदंड अपरिवर्तनीय होता है, इसलिए कानून अत्यंत सावधानी बरतता है कि सर्वोच्च न्यायालय तक उपलब्ध प्रत्येक संवैधानिक अपील-मार्ग वास्तविक रूप से सुलभ रहे, तभी निष्पादन आगे बढ़े। यह प्रावधान अनिवार्य स्थगन के नियम स्थापित करता है ताकि दोषसिद्ध व्यक्ति का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनरावलोकन पाने का अधिकार समय से पहले निष्पादन के कारण निष्फल न हो। यह पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 415 से मेल खाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने यह माना है कि मृत्युदंड का निष्पादन करने से पहले अपील और पुनर्विचार की हर उपचारात्मक प्रक्रिया का उपभोग करने का अधिकार, मृत्यु दंड की निष्पक्षता का बुनियादी तत्व है; और इस अनिवार्य स्थगन-आवश्यकता में देरी या उल्लंघन को उच्चतर न्यायालयों ने कभी-कभी मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने के आधार के रूप में उद्धृत किया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि दोषी केवल यह कह दे कि वह शायद अपील करेगा, तो उच्च न्यायालय का मृत्युदंड तुरंत ही लागू किया जा सकता है।

    तथ्य: उच्च न्यायालय पर कानूनी दायित्व है कि वह दंड के निष्पादन को तब तक स्थगित रखे जब तक सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने की अवधि समाप्त न हो जाए, या दायर अपील अथवा प्रमाणपत्र-आवेदन का निर्णय न हो जाए, या विशेष अनुमतिपत्र की याचिका दायर करने के लिए पर्याप्त समय न दे दिया जाए।