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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 206

High Court to decide, in case of doubt, district where inquiry or trial shall take place

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक मामले कभी-कभी एक से अधिक स्थानों पर दर्ज या रिपोर्ट हो जाते हैं—उदाहरण के लिए, जब अपराध कई जिलों या राज्यों में फैला हो, या अलग-अलग न्यायालयों में अलग-अलग शिकायतें दायर हों। यदि इसे सुलझाने का कोई नियम न हो, तो वही व्यक्ति एक ही कृत्य के लिए समानांतर मुकदमों का सामना कर सकता है, जिससे न्यायिक संसाधनों की बर्बादी और परस्पर-विरुद्ध निर्णयों का जोखिम पैदा होता है। पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 186 से आगे बढ़ाई गई यह व्यवस्था एक स्पष्ट श्रेणीक्रम देती है: सम्बद्ध उच्च न्यायालय आगे आकर एक उपयुक्त मंच चुनता है और बाकी कार्यवाहियों को समाप्त कर देता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (दंप्रसं धारा 186) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार माना कि यह नियम तभी लागू होता है जब न्यायालयों ने वास्तव में उसी अपराध का ‘ज्ञान ग्रहण’ (cognizance) कर लिया हो, मात्र इस आधार पर नहीं कि कई स्थानों पर प्राथमिकी दर्ज हुई है। उच्च न्यायालयों ने निष्पक्ष व दक्ष विचारण के हित में, जहाँ जाँच अधिक आगे बढ़ी हो या जहाँ गवाह और साक्ष्य केन्द्रित हों, उसे देखते हुए, मुकदमों का समेकन कर कार्यवाही की बहुलता से बचने के लिए इस शक्ति का उपयोग किया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा तब भी लागू होती है जब एक ही घटना के लिए एक से अधिक थानों में प्राथमिकी दर्ज हो।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह नियम तभी प्रभाव में आता है जब न्यायालय अपराध का औपचारिक रूप से ज्ञान ग्रहण कर लें; केवल प्राथमिकी या जाँच के चरण में यह लागू नहीं होता।

  • मिथक: कोई भी न्यायालय यह तय कर सकता है कि टकराव होने पर किसे आगे बढ़ना चाहिए।

    तथ्य: केवल उच्च न्यायालय (या, यदि सम्बद्ध न्यायालय भिन्न-भिन्न उच्च न्यायालयों के अधीन हों, तो वह उच्च न्यायालय जिसके क्षेत्र में कार्यवाही पहले शुरू हुई) को ही यह प्रश्न सुलझाने का अधिकार है।