Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 205
Power to order cases to be tried in different sessions divisions
Notwithstanding anything contained in the preceding provisions of this Chapter, the State Government may direct that any case or class of cases committed for trial in any district may be tried in any sessions division: Provided that such direction is not repugnant to any direction previously issued by the High Court or the Supreme Court under the Constitution, or under this Sanhita or any other law for the time being in force.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय आपराधिक प्रक्रिया की एक दीर्घकालिक विशेषता (पूर्व में CrPC, 1973 की धारा 194 में) को आगे बढ़ाता है, जो राज्य सरकारों को सत्र न्यायालयों के कार्यभार और भौगोलिक व्यवस्थापन में प्रशासनिक लचीलापन देता है। ज़िलों में न्यायाधीशों की कमी, सुरक्षा या निष्पक्षता के लिए स्थानांतरण योग्य संवेदनशील/उच्च-प्रोफ़ाइल मामले, या साधन-सुविधा जैसे हालात आ सकते हैं—यह धारा कार्यपालिका को प्रत्येक बार नया विधेयक लाए बिना सत्र प्रभागों के बीच विचारण पुनर्निर्देशित करने की अनुमति देती है, जबकि जहाँ उच्चतर न्यायपालिका ने पहले से मार्गदर्शन दिया हो वहाँ उनके अधिकार-क्षेत्र का सम्मान भी सुनिश्चित करती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः इस शक्ति को राज्य सरकार का न्यायिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्य माना है—जिसका उद्देश्य सत्र न्यायालयों का सुचारु संचालन है, न कि किसी विशेष मुकदमे के परिणाम को प्रभावित करना। समकक्ष CrPC प्रावधान के अंतर्गत न्यायनज़ीरों ने रेखांकित किया कि यह शक्ति न्यायिक कार्य-संचालन को कुशलतापूर्वक व्यवस्थित करने के लिए है, न कि अभियोजन या बचाव पक्ष के लाभ हेतु मनचाहा मंच चुनने के लिए। उपबंध (प्रोवाइज़ो) को एक सुरक्षा-कवच के रूप में पढ़ा गया है जो सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका के प्रशासनिक निर्देश, अधिकार-क्षेत्र या स्थानांतरण पर संवैधानिक न्यायालयों द्वारा पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों को कभी निरस्त या उनके विपरीत न हों।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह प्रावधान राज्य सरकार को किसी चल रहे मुकदमे के परिणाम या फ़ैसले में दखल देने देता है।
तथ्य: यह केवल इस बात का प्रशासनिक पुनर्निर्देशन अनुमति देता है कि मामला कहाँ सुना जाएगा; यह इस पर कोई नियंत्रण नहीं देता कि उसे कैसे परखा या तय किया जाएगा।
मिथक: राज्य सरकार इस शक्ति का प्रयोग करके किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को निरस्त कर सकती है।
तथ्य: उपबंध (प्रोवाइज़ो) स्पष्ट रूप से सरकार को उन संवैधानिक न्यायालयों द्वारा पहले से जारी निर्देशों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने से रोकता है।