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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 21

Courts by which offences are triable

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक मुकदमों के लिए साफ़ प्रारंभिक बिंदु ज़रूरी है: किस न्यायालय को किस मामले की सुनवाई का अधिकार है। यह प्रावधान, पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 26 से आगे बढ़ाया गया, ऐसा मानचित्र बनाता है ताकि गम्भीर अपराध समान वरिष्ठता वाले न्यायालयों (जैसे गम्भीर अपराधों के लिए सत्र न्यायालय) में जाएँ, जबकि छोटे अपराध प्रथम अनुसूची में नामित निचली अदालतों में निपटाए जा सकें। जिन लैंगिक अपराधों की सुनवाई महिला-अध्यक्षता वाली अदालत में कराने की शर्त जोड़ी गई है, वह यौन हिंसा से बचे लोगों के लिए अदालत की प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और कम भयावह बनाने के सुधारों को दर्शाती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (CrPC, 1973 की धारा 26) के अंतर्गत, न्यायालय सामान्यतः मामलों के दैनिक आवंटन के लिए प्रथम अनुसूची को व्यावहारिक मार्गदर्शक मानते रहे, जबकि अधिक दण्ड वाली धाराओं के अपराध सत्र न्यायालयों के लिए सुरक्षित रहे। न्यायालयों ने महिला-न्यायाधीश संबंधी उपबंध के ‘यथासंभव’ शब्दों को अनिवार्य के बजाय निर्देशात्मक माना है — अर्थात यदि महिला न्यायाधीश उपलब्ध न हो तो किसी अन्य न्यायाधीश द्वारा सुनवाई अपने आप अमान्य नहीं होती, यद्यपि प्राधिकरणों से ईमानदार प्रयास की अपेक्षा रहती है कि वे इसका अनुपालन कराएँ।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सभी आपराधिक मुकदमे उच्च न्यायालय में ही होने चाहिए।

    तथ्य: केवल कुछ मामलों ही उच्च न्यायालय में जाते हैं; अधिकांश मामलों की सुनवाई सत्र न्यायालयों या मजिस्ट्रेट अदालतों में होती है, जैसा कि प्रथम अनुसूची निर्देशित करती है।

  • मिथक: लैंगिक अपराधों के मुकदमों में महिला न्यायाधीश की शर्त पूर्णतया अनिवार्य है और किसी अन्य द्वारा की गई सुनवाई अमान्य हो जाती है।

    तथ्य: क़ानून ‘यथासंभव’ कहता है, यानी अदालतों को ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करना चाहिए, पर यदि महिला न्यायाधीश उपलब्ध न हो तो केवल उसी कारण से मुकदमा अपने आप शून्य नहीं हो जाता।