Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 68

Service on Government servant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

स्थानांतरणीय पदों, रक्षा, पुलिस या ऐसे नियुक्तियों में रहने वाले सरकारी कर्मचारियों को, जो अपने दर्ज पते से दूर रहते हैं, न्यायालय के प्रक्रम-सेवकों के लिए शारीरिक रूप से ढूंढ पाना कठिन हो सकता है। यह प्रावधान एक व्यावहारिक मार्ग देता है: तलब को कर्मचारी के नियोक्ता (विभागाध्यक्ष) के माध्यम से भेजा जाए, जिसके पास कर्मचारी के ठिकाने और ड्यूटी-स्थिति की विश्वसनीय जानकारी होती है। इससे बार-बार असफल सेवा-प्रयासों और आपराधिक कार्यवाही में देरी से बचाव होता है, जबकि वास्तविक सुपुर्दगी अब भी धारा 64 के अंतर्गत सामान्य व्यक्तिगत सेवा की प्रक्रिया के अनुसार ही कराई जानी आवश्यक रहती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः इसे सरकारी सेवकों पर तलब की सेवा का सहायक, वैकल्पिक तरीका माना है, न कि अनिवार्य और एकमात्र मार्ग — ‘साधारणतः’ शब्द विवेक का संकेत है, अतः सुविधाजनक होने पर न्यायालय सीधे व्यक्तिगत सेवा का प्रयत्न कर सकते हैं। समतुल्य पूर्व प्रावधान (CrPC, 1973 की धारा 62) के अंतर्गत न्यायिक निर्णयों ने माना है कि कार्यालय प्रमुख का अनुमोदित हस्ताक्षर सेवा का प्रबल साक्ष्य है, और यदि कार्यालय प्रमुख तलब अग्रेषित करने में विफल रहता है तो इससे कार्यवाही स्वतः शून्य नहीं हो जाती, यद्यपि न्यायालय को सेवा के अन्य तरीकों की पड़ताल करनी पड़ सकती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह सरकारी कर्मचारियों को तलब की सेवा करने का एकमात्र तरीका है।

    तथ्य: ‘साधारणतः’ शब्द का अर्थ है कि न्यायालयों के पास विवेक है; उपयुक्त होने पर वे अब भी सीधे धारा 64 के तहत मानक व्यक्तिगत सेवा के तरीके अपना सकते हैं।

  • मिथक: केवल कार्यालय प्रमुख के हस्ताक्षर का अर्थ यह नहीं है कि मामला आगे बढ़ सकता है भले ही कर्मचारी को वास्तव में तलब मिली ही न हो।

    तथ्य: हस्ताक्षर विधिवत् सेवा का साक्ष्य है, पर इसका तात्पर्य यही है कि मूल सुपुर्दगी धारा 64 की प्रक्रिया का पालन करते हुए हुई—यह वास्तविक सुपुर्दगी का विकल्प नहीं, बल्कि उसका प्रमाण है।