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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 20

Directorate of Prosecution

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

इस प्रावधान से पहले, कई राज्यों में अभियोजन कार्य ढीले-ढाले ढंग से पर्यवेक्षित था, जिससे देरी, मामलों के असंगत प्रबंधन, और पुलिस व लोक अभियोजकों के बीच कमजोर समन्वय जैसी समस्याएँ थीं। पहले से अस्तित्वमान कुछ राज्य-स्तरीय अभियोजन संचालनालय योजनाओं (कुछ राज्यों जैसे Maharashtra और Gujarat में ऐसे संचालनालय प्रशासनिक रूप से थे) से ग्रहण कर और उसे निखार कर, यह धारा एक औपचारिक पर्यवेक्षीय पदानुक्रम स्थापित करती है, ताकि गंभीर मामलों को प्राथमिकता निगरानी मिले, अभियोजक व्यावसायिक रूप से जवाबदेह हों, और पुलिस से पृथक एक स्पष्ट प्रशासनिक ढांचा बने, जिससे व्यक्तिगत अभियोजन में कार्यपालिका के हस्तक्षेप का जोखिम घटे।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: हर राज्य को इस धारा के अंतर्गत एक अभियोजन संचालनालय स्थापित करना अनिवार्य है।

    तथ्य: यहाँ प्रयुक्त शब्द ‘may’ इस अर्थ में है कि राज्य सरकारों के लिए यह वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं।

  • मिथक: अभियोजन संचालनालय पुलिस का स्थान लेता है या उस पर नियंत्रण करता है।

    तथ्य: यह केवल लोक अभियोजकों और मामलों की प्रगति का पर्यवेक्षण व निगरानी करता है; पुलिस अनुसंधान (जांच) पर इसका कोई अधिकार नहीं है।

  • मिथक: महाधिवक्ता भी अभियोजन निदेशक के नियंत्रण में होते हैं।

    तथ्य: उपधारा (12) स्पष्ट रूप से यह अपवाद देती है कि जब महाधिवक्ता लोक अभियोजक के रूप में कार्य कर रहे हों, तब यह धारा उन पर लागू नहीं होती।