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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 19

Assistant Public Prosecutors

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक मुक़दमों में निष्पक्षता तभी सम्भव है जब अपराध की जाँच करने वाला व्यक्ति और अदालत में मामला प्रस्तुत करने वाला अभियोजक अलग हों, ताकि अभियोजक पुलिस के संस्करण का मात्र बचाव करने के बजाय साक्ष्यों का स्वतन्त्र मूल्यांकन कर सके। यह प्रावधान (जिससे पहले की रूपरेखा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 25 में मिलती थी) सुनिश्चित करता है कि हर ज़िले में मजिस्ट्रेट-स्तरीय मामलों के लिए समर्पित अभियोजक हों, केंद्र को केंद्रीय विषयों वाले मामलों में हस्तक्षेप की गुंजाइश देता है, तथा आपात स्थिति में ज़िलाधिकारी को स्थानापन्न अभियोजक नियुक्त करने का सुरक्षा-वाल्व देता है — साथ ही पारदर्शिता (राज्य को सूचना) और हित-संघर्ष या अयोग्य पुलिस कर्मियों को अभियोजक बनाए जाने के विरुद्ध सुरक्षा उपायों को भी बनाए रखता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

चूँकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 हाल में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का प्रतिस्थापन है, इस सटीक अनुभाग की व्याख्या करने वाला स्थिर न्यायनिरूपण अभी उपलब्ध नहीं है। तथापि, समकक्ष पुराने प्रावधान की व्याख्या करते समय न्यायालयों ने लगातार रेखांकित किया है कि जाँचकर्ता और अभियोजक की भूमिकाओं का पृथक्करण निष्पक्ष सुनवाई के लिए अनिवार्य है, और यह कि स्थानापन्न अभियोजकों की नियुक्ति क़ानून में निहित प्रक्रिया-सुरक्षाओं (जैसे सूचना देने की शर्त) का कड़ाई से पालन करके ही होनी चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: किसी भी पुलिस अधिकारी को कमी होने पर सहायक लोक अभियोजक नहीं बनाया जा सकता।

    तथ्य: क़ानून उस पुलिस अधिकारी की नियुक्ति पर रोक लगाता है जिसने मामले की जाँच की हो, और साथ ही निरीक्षक के पद से नीचे के किसी भी व्यक्ति को APP नियुक्त करने पर भी रोक लगाता है।

  • मिथक: यह कथन ग़लत है: ज़िलाधिकारी बिना किसी को बताए तत्काल स्थानापन्न अभियोजक नियुक्त नहीं कर सकते।

    तथ्य: ज़िलाधिकारी को किसी मामले के लिए स्थानापन्न सहायक लोक अभियोजक नियुक्त करने से पहले राज्य सरकार को 14 दिनों की पूर्व-सूचना देना अनिवार्य है।