The Constitution of India
अनुच्छेद 246A
माल और सेवा कर के संबंध में विशेष उपबंध
माल और सेवा कर के संबंध में विशेष उपबंध — (1) अनुच्छेद 246 और अनुच्छेद 254 में किसी बात के होते हए भी, संसद् को, और खंड (2) के अधीन रहते हुए प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल को, संघ द्वारा या उस राज्य द्वारा अधिरोपित माल और सेवा कर के संबंध में विधियां बनाने की शक्ति होगी । (2) जहां माल का या सेवाओं का अथवा दोनों का प्रदाय अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में होता है वहां संसद् को, माल और सेवा कर के संबंध में विधियां बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है । स्पष्टीकरण — इस अनुच्छेद के उपबंध, अनुच्छेद 279क के खंड (5) में निर्दिष्ट माल और सेवा कर के संबंध में, माल और सेवा कर परिषद् द्वारा सिफारिश की गई तारीख से प्रभावी होंगे ।]।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
2017 से पहले भारत में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था खंडित थी—राज्य और केंद्र, दोनों, वस्तुओं व सेवाओं पर अलग-अलग कर लगाते थे (वैट, उत्पाद शुल्क, सेवा कर इत्यादि), जिससे कर-पर-कर का बोझ और अनुपालन में अव्यवस्था पैदा होती थी। 101वाँ संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2016 ने Article 246A जोड़कर एक एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था बनाई, जिससे पहली बार संघ और राज्यों को एक ही विषय पर समवर्ती कराधान शक्ति मिली; साथ ही अंतर-राज्यीय जीएसटी को केवल संसद के लिए सुरक्षित रखा गया ताकि राज्य सीमाओं के पार इसे सरल और एकरूप रखा जा सके।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
Union of India v. Mohit Minerals Pvt. Ltd. (2022) में, सर्वोच्च न्यायालय ने Article 246A को Article 279A के साथ पढ़ते हुए स्थापित सहकारी संघवाद की संरचना का परीक्षण किया। न्यायालय ने माना कि जीएसटी परिषद की अनुशंसाएँ बाध्यकारी नहीं बल्कि प्रेरक (persuasive) हैं, क्योंकि Article 246A के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं—दोनों—के पास परस्पर स्वतंत्र और साथ-साथ विधायी शक्ति है; वे परिषद के अधीनस्थ नहीं हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि जीएसटी लागू होते ही राज्यों की सारी कर लगाने की शक्ति समाप्त हो गई।
तथ्य: राज्यों की शक्ति समाप्त नहीं हुई—Article 246A उन्हें विशेष रूप से अपने क्षेत्र के भीतर होने वाली आपूर्तियों पर, संसद के साथ-साथ, जीएसटी कानून बनाने की समवर्ती शक्ति देता है।
मिथक: यह कहना गलत है कि जीएसटी परिषद की अनुशंसाएँ संसद और राज्यों पर विधिक रूप से बाध्यकारी हैं।
तथ्य: सर्वोच्च न्यायालय ने Mohit Minerals (2022) में स्पष्ट किया कि जीएसटी परिषद की अनुशंसाएँ केवल प्रेरक हैं; Article 246A के तहत संसद और राज्य विधानसभाएँ अपनी स्वतंत्र विधि-निर्माण शक्ति बनाए रखती हैं।