Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 254

संसद् द्वारा बनाई गई विधियों और राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति

संसद् द्वारा बनाई गई विधियों और राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति — (1) यदि किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबंध संसद् द्वारा बनाई गई विधि के, जिसे अधिनियमित करने के लिए संसद् सक्षम है, किसी उपबंध के या समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में विद्यमान विधि के किसी उपबंध के विरुद्ध है तो खंड (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, संसद् द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह ऐसे राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की गई हो, या विद्यमान विधि, अभिभावी होगी और उस राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी । (2) जहां 1*** राज्य के विधान-मंडल द्वारा समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में बनाई गई विधि में कोई ऐसा उपबंध अंतर्विष्ट है जो संसद् द्वारा पहले बनाई गई विधि के या उस विषय के संबंध में किसी विद्यमान विधि के उपबंधों के विरुद्ध है तो यदि ऐसे राज्य के विधान-मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है और उस पर उसकी अनुमति मिल गई है तो वह विधि उस राज्य में अभिभावी होगी: परंतु इस खंड की कोई बात संसद् को उसी विषय के संबंध में कोई विधि, जिसके अंतर्गत ऐसी विधि है, जो राज्य के विधान-मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्धन, संशोधन, परिवर्तन या निरसन करती है, किसी भी समय अधिनियमित करने से निवारित नहीं करेगी ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत के संविधान ने कुछ विषय (जैसे आपराधिक विधि, विवाह, शिक्षा) समवर्ती सूची में रखे हैं, जिन पर संसद और राज्य विधानसभाएँ दोनों कानून बना सकती हैं। इससे टकराव का जोखिम पैदा होता है। प्रारूपकारों ने, Government of India Act, 1935 के समान प्रावधानों से प्रेरणा लेते हुए, यह स्पष्ट नियम चाहिए था कि किसका कानून प्रधान होगा—साथ ही राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप राष्ट्रपति की स्वीकृति के माध्यम से कुछ हद तक कानून बनाने की गुंजाइश भी मिले, पर ऐसा न हो कि राष्ट्रीय एकरूपता स्थायी रूप से बाधित हो जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 254 के अंतर्गत ‘विरुद्धता’ (repugnancy) तभी उत्पन्न होती है जब दोनों कानूनों में ऐसा प्रत्यक्ष और असमाधेय टकराव हो कि एक का पालन करना दूसरे का उल्लंघन करना हो (जैसा कि M. Karunanidhi v. Union of India, 1979 जैसे मामलों में चर्चा हुई)। न्यायालयों ने यह भी माना है कि कुछ स्थितियों में, भले ही प्रत्यक्ष टकराव न हो, यदि संसद और राज्य के कानून एक ही क्षेत्र पर अधिकार करते हों तो विरुद्धता हो सकती है; मात्र आच्छादन पर्याप्त नहीं है यदि दोनों साथ‑साथ संचालित हो सकें। अतिरिक्त रूप से, न्यायालयों ने कहा है कि अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति उस समय विद्यमान केंद्रीय/संसदीय कानूनों के साथ विरुद्धता से ही राज्य कानून की रक्षा करती है, भविष्य के केंद्रीय कानूनों से नहीं; और स्वीकृति वास्तविक रूप से उसी राज्य कानून के प्रावधानों पर विचार कर दी जानी चाहिए, उसे यांत्रिक ढंग से नहीं दिया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी भी विषय पर राज्य और केंद्र के कानून में थोड़ा भी आच्छादन हो जाए तो राज्य का कानून अपने‑आप शून्य हो जाता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने कहा है कि वास्तविक विरुद्धता वही है जब प्रत्यक्ष और असमाधेय टकराव हो; यदि दोनों कानून बिना विरोधाभास के साथ‑साथ चल सकते हैं, तो राज्य कानून अपने‑आप अमान्य नहीं होता।

  • मिथक: एक बार राज्य कानून को अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाए, तो वह उस विषय पर स्थायी रूप से केंद्रीय कानून से ऊपर हो जाता है।

    तथ्य: संसद बाद में उसी विषय पर नया कानून बना सकती है, और वह नया केंद्रीय कानून पहले से स्वीकृत राज्य कानून पर भी प्रधान हो सकता है।