The Constitution of India
अनुच्छेद 253
अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान
अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान — इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, संसद् को किसी अन्य देश या देशों के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय अथवा किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या अन्य निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई विधि बनाने की शक्ति है ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत के संविधान में विधायी विषय संघ और राज्यों के बीच विभाजित हैं। परंतु अंतरराष्ट्रीय दायित्व—जैसे पर्यावरणीय संधियाँ, व्यापार समझौते या मानवाधिकार अभिसमय—अक्सर उन विषयों (स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय संसाधन) से जुड़ते हैं जो राज्य सूची में आते हैं। निर्माताओं ने, यह समझते हुए कि संघीय विभाजन के कारण भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन में बाधा नहीं आनी चाहिए, संसद को एक अधिरोहक शक्ति दी कि जब भी किसी संधि या अंतरराष्ट्रीय निर्णय के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय कानून आवश्यक हो, वह समूचे देश में कानून बना सके। इससे विश्व मंच पर भारत एक राष्ट्र के रूप में एक स्वर में बोल और काम कर सकता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
Maganbhai Ishwarbhai Patel v. Union of India (1969) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जहाँ अनुच्छेद 73 के अंतर्गत कार्यपालिका संधियाँ कर सकती है, वहीं किसी संधि को लागू करने के लिए नागरिकों के अधिकारों या राज्य कानूनों में परिवर्तन करने हेतु पृथक विधेयन आवश्यक है—जो प्रायः अनुच्छेद 253 के अंतर्गत होता है। बाद में Gramophone Company of India Ltd. v. Birendra Bahadur Pandey (1984) में न्यायालय ने माना कि अंतरराष्ट्रीय संधियाँ अपने-आप भारत में प्रवर्तनीय घरेलू कानून नहीं बन जातीं; संसद को विधि बनाकर उन्हें रूपांतरित करना पड़ता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति भारत की ‘द्वैतवादी’ (dualist) पद्धति की पुष्टि होती है। न्यायालयों ने अनुच्छेद 253 का (अनुच्छेद 51(c) के साथ) संदर्भ लेते हुए CEDAW जैसे अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों से घरेलू कानून की रिक्तियाँ भरने में सहायता ली है, जैसा Vishaka v. State of Rajasthan (1997) में हुआ; यद्यपि उस वाद का आधार प्रत्यक्षतः संवैधानिक व्याख्या थी, न कि कोई नया अनुच्छेद 253 आधारित कानून।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: एक बार भारत किसी अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर कर दे, तो वह अपने-आप देश के भीतर प्रवर्तनीय कानून बन जाती है।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि संधियाँ भारत में स्वयंसंचालित (self-executing) नहीं होतीं; उनकी शर्तों को घरेलू रूप से प्रवर्तनीय बनाने के लिए संसद को अनुच्छेद 253 के तहत विशेष कानून पारित करना पड़ता है।
मिथक: अनुच्छेद 253 कार्यपालिका को, संसद की भागीदारी के बिना ही, सीधे राज्य कानूनों को अप्रभावी करने का अधिकार देता है।
तथ्य: अनुच्छेद 253 के अंतर्गत शक्ति संसद (विधायिका) के पास है, कार्यपालिका के पास नहीं; केवल कार्यपालिका का आदेश या संधि-हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं, एक औपचारिक कानून पारित होना चाहिए।