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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 250

यदि आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्य सूची में के विषय के संबंध में विधि बनाने की संसद् की शक्ति

यदि आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्य सूची में के विषय के संबंध में विधि बनाने की संसद् की शक्ति — (1) इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, संसद् को, जब तक आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है, 1अनुच्छेद 246क के अधीन उपबंधित माल या सेवा कर या] राज्य सूची में प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति होगी । (2) संसद् द्वारा बनाई गई कोई विधि, जिसे संसद् आपात की उद्घोषणा के अभाव में बनाने के लिए सक्षम नहीं होती, उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रहने के पश्चात् छह मास की अवधि की समाप्ति पर अक्षमता की मात्रा तक उन बातों के सिवाय प्रभावी नहीं रहेगी जिन्हें उक्त अवधि की समाप्ति से पहले किया गया है या करने का लोप किया गया है ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत का संविधान सामान्यतः संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के माध्यम से संसद और राज्य विधानसभाओं के बीच विधि-निर्माण की शक्तियाँ बाँटता है। परन्तु निर्माताओं ने ऐसे संकटों—युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह—की कल्पना की थी, जब त्वरित और एकरूप राष्ट्रीय कार्यवाही की आवश्यकता पड़ सकती है, भले ही विषय प्रायः राज्यों के अधीन हों (जैसे लोक व्यवस्था या कृषि)। अनुच्छेद 250 आपातकाल की उद्घोषणा के दौरान संसद को उस क्षेत्र में अस्थायी रूप से प्रवेश करने देता है, ताकि देश एक इकाई की तरह प्रतिक्रिया दे सके। उपबंध (2) में छह महीने की समाप्ति-धारा इसलिए जोड़ी गई कि संकट टलने पर संघवाद का क्षरण स्थायी न हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः अनुच्छेद 250 को व्यापक आपातकालीन ढाँचे (अनुच्छेद 352-360) का हिस्सा मानकर पढ़ा है, और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय Minerva Mills v. Union of India (1980) के साथ जोड़कर समझा है, जिसमें रेखांकित किया गया कि आपातकालीन शक्तियाँ अस्थायी रहें और न्यायिक व राजनीतिक नियंत्रणों के अधीन हों, न कि स्थायी केंद्रीकरण का साधन। यद्यपि अनुच्छेद 250 की अलग से व्यापक व्याख्या अक्सर आवश्यक नहीं पड़ी—क्योंकि इसके प्रयोग विरल और अल्पकालिक रहे—फिर भी इसकी तर्क-प्रणाली को संविधान के ‘लचीले संघवाद’ के उदाहरण के रूप में चर्चा में लिया गया है, जो केवल वास्तविक संकट में केंद्र की ओर झुकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 250 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून सदा के लिए चलते हैं।

    तथ्य: उपबंध (2) स्पष्ट करता है कि जो कानून संसद केवल आपातकाल के कारण बना सकती थी, वे आपातकाल समाप्त होने के छह महीने बाद स्वतः समाप्त हो जाते हैं, जब तक कि उन्हें संसद की सामान्य शक्तियों के माध्यम से पुनः अधिनियमित न किया जाए।

  • मिथक: अनुच्छेद 250 संसद को राज्य सूची के विषय स्थायी रूप से अपने अधीन करने देता है।

    तथ्य: यह शक्ति केवल ‘जब आपातकाल की उद्घोषणा प्रभाव में हो’ तब तक अस्तित्व में रहती है—यह अस्थायी है और सख्ती से आपातकाल की अवधि से बँधी है।