Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 26

Cases in which statement of relevant fact by person who is dead or cannot be found, etc., is

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः साक्ष्य-नियम चाहते हैं कि गवाह अदालत में उपस्थित हों, शपथ लें, और जिरह का सामना करें ताकि उनकी सच्चाई परखी जा सके। पर कभी-कभी तथ्य का एकमात्र जानकार व्यक्ति मर चुका होता है, लापता होता है, मानसिक या शारीरिक रूप से गवाही देने में असमर्थ होता है, या उसे लाना अत्यधिक खर्च या विलंब के बिना नामुमकिन होता है। न्याय केवल इसलिए विफल न हो कि गवाह उपलब्ध नहीं है, इस हेतु — भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 32 से विरासत में मिली — यह प्रावधान कुछ विशिष्ट, विश्वसनीय अपवाद-श्रेणियाँ तय करता है जिनकी अप्रत्यक्ष कथन-प्रकृति के बावजूद न्यायालय उन्हें स्वीकार कर सकते हैं; मुख्यतः इसलिए कि परिस्थितियाँ (मरणासन्न कथन, नियमित व्यवसाय अभिलेख, स्व-विरुद्ध कथन, पुराने पारिवारिक अभिलेख) उन कथनों को बिना जिरह के भी स्वाभाविक रूप से भरोसेमंद बनाती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने साक्ष्य अधिनियम की पूर्ववर्ती धारा 32 की व्याख्या करते हुए, खासकर उपबंध (a) — ‘मरणासन्न कथन’ — के इर्द-गिर्द व्यापक विधि-विकास किया है। न्यायालयों ने माना है कि यदि मरणासन्न कथन विश्वसनीय प्रतीत हो, स्वैच्छिक और सुसंगत हो, तो वह अकेले भी दोषसिद्धि का आधार बन सकता है, परंतु एकाधिक या परस्पर-विरोधी मरणासन्न कथनों की सूक्ष्म जाँच आवश्यक है (जैसा Khushal Rao v. State of Bombay जैसे प्रकरणों और बाद के परिष्करणों में देखा गया)। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि कथन के पात्र को मृत्यु आसन्न होने का विश्वास होना आवश्यक नहीं, और ऐसे कथन कार्यवाही के स्वरूप से निरपेक्ष होकर — दीवानी या दंडात्मक — ग्राह्य होते हैं। जहाँ तक व्यवसाय-अभिलेख और स्व-विरुद्ध कथनों का प्रश्न है, न्यायालय यह प्रमाण अपेक्षित करते हैं कि प्रविष्टियाँ कर्तव्य के साधारण, नियमित निर्वहन में की गई थीं, न कि वाद-विवाद के लिए निर्मित।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: मरणासन्न कथन तभी मान्य है जब व्यक्ति को यकीन हो कि वह मरने वाला है।

    तथ्य: क़ानून साफ कहता है कि व्यक्ति को कथन करते समय मृत्यु की आशंका रही हो या नहीं, कथन फिर भी प्रासंगिक है।

  • मिथक: यह धारा केवल हत्या या आपराधिक मामलों पर ही लागू होती है।

    तथ्य: क़ानून कहता है कि ऐसे कथन ‘कार्यवाही के स्वरूप चाहे जो हों’ ग्राह्य हैं — जिनमें दीवानी वाद, जैसे विधि-विरुद्ध मृत्यु का दावा, भी शामिल है।

  • मिथक: मृत व्यक्ति का कोई भी पुराना कथन साक्ष्य के रूप में चल जाएगा।

    तथ्य: केवल वे कथन मान्य हैं जो विशिष्ट श्रेणियों (a) से (h) — जैसे मरणासन्न कथन, व्यवसाय अभिलेख, या स्व-विरुद्ध कथन — में फिट बैठते हों; सामान्य अप्रत्यक्ष कथन (हियरसे) स्वतः ग्राह्य नहीं होते।