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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 141

Judge to decide as to admissibility of evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पुराने Indian Evidence Act, 1872 की Section 136 से प्रेरित, जिसके प्रণेताओं में Sir James Fitzjames Stephen सम्मिलित थे) मुकदमों को केंद्रित और सुव्यवस्थित रखने के लिए है। ऐसे नियम के बिना, पक्षकार ऐसे अनेक तथ्य पेश कर सकते थे जो महत्वपूर्ण लगें पर वास्तव में मामले से संबंध न रखते हों, जिससे समय नष्ट हो और तथ्य‑निर्धारक भ्रमित हो। यह प्रावधान न्यायाधीशों को सक्रिय द्वारपाल की भूमिका देता है — सबूत को स्वीकार करने से पहले प्रासंगिकता की परीक्षा — और जब किसी तथ्य की प्रासंगिकता दूसरे पर शृंखलाबद्ध हो, तब तार्किक क्रम का प्रबंधन करने का अधिकार।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

Evidence Act, 1872 की समान पूर्ववर्ती Section 136 के तहत न्यायालयों ने माना कि यह धारा न्यायाधीश को पर्यवेक्षी, लगभग अन्वेषणात्मक शक्ति देती है, ताकि सबूत को अंदर आने देने से पहले उसकी प्रासंगिकता परखी जा सके, न कि ग्राह्यता केवल पक्षकारों पर छोड़ दी जाए। उपधारा (3) के अंतर्गत न्यायाधीशों ने अपने विवेक का लचीले ढंग से उपयोग किया है — कभी‑कभी ‘सशर्त प्रासंगिकता’ वाले सबूत को अस्थायी रूप से स्वीकार कर लेते हैं, इस शर्त पर कि जोड़ने वाला तथ्य बाद में सिद्ध किया जाएगा, ताकि मुकदमे की स्वाभाविक धारा बाधित न हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी सबूत जो वकील पेश करना चाहे, उसे अपने आप अदालत में स्वीकार कर लेना चाहिए।

    तथ्य: न्यायाधीश के पास पहले यह पूछने की शक्ति है कि सबूत कैसे प्रासंगिक है, और यदि उसका मामले से तार्किक संबंध नहीं है, तो उसे स्वीकार करने से मना कर सकते हैं।

  • मिथक: तथ्यों को हमेशा उसी क्रम में सिद्ध करना चाहिए जिस क्रम में वे घटित हुए थे।

    तथ्य: न्यायाधीश के पास लचीले क्रम की अनुमति देने का विवेक है — कभी‑कभी किसी तथ्य को पहले सिद्ध करने देते हैं, भले वह तार्किक रूप से किसी और पर निर्भर हो, बशर्ते अंततः वह कड़ी सिद्ध कर दी जाए।