Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 142
Examination of witnesses
(1) The examination of a witness by the party who calls him shall be called his examination-in-chief.
(2) The examination of a witness by the adverse party shall be called his cross-examination.
(3) The examination of a witness, subsequent to the cross-examination, by the party who called him, shall be called his re-examination.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
विचारण प्रक्रियाएँ मौखिक गवाही पर आधारित होती हैं, और निष्पक्षता के लिए उस गवाही की जाँच का एक संरचित तरीका आवश्यक है। अंग्रेज़ी कॉमन लॉ ने यह तीन-चरणीय क्रम विकसित किया ताकि प्रत्येक पक्ष अपने गवाह का बयान प्रस्तुत कर सके, प्रतिपक्ष उसे चुनौती दे सके, और मूल पक्ष जिरह में उठे बिंदुओं को स्पष्ट कर सके। भारत के Evidence Act, 1872 ने इसे धारा 137 में संहिताबद्ध किया, और Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 ने इसका सार बदले बिना आधुनिक भाषा में धारा 142 के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (Evidence Act, 1872 की धारा 137) के तहत, न्यायालयों ने लगातार माना कि मुख्य-परीक्षण उन्हीं प्रासंगिक तथ्यों तक सीमित होना चाहिए जिन पर गवाह बोल सकता है; जिरह किसी भी प्रासंगिक विषय तक, जिसमें विश्वसनीयता भी शामिल है, फैल सकती है; और पुनः-परीक्षण जिरह में उठे मसलों को समझाने तक सीमित है, जब तक कि न्यायालय नए विषय की अनुमति न दे (और उस नए विषय पर आगे की जिरह की गुंजाइश रहे)। क्योंकि पाठ में सारगत बदलाव नहीं है, ये व्याख्यात्मक सिद्धांत धारा 142 पर भी चलते रहने की अपेक्षा है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: पुनः-परीक्षण से किसी पक्ष को वे सब प्रश्न पूछने की छूट मिलती है जो वह पहले पूछना भूल गया था।
तथ्य: सामान्यतः न्यायालयों ने माना है कि पुनः-परीक्षण जिरह के दौरान उठी बातों को समझाने तक सीमित है; बिल्कुल नए विषय नहीं लाए जा सकते, जब तक न्यायालय विशेष रूप से इसकी अनुमति न दे।
मिथक: जिरह केवल विपक्षी वकील द्वारा, मुख्य-परीक्षण में कहे गए तथ्यों के बारे में ही की जा सकती है।
तथ्य: न्यायालयों ने जिरह को व्यापक रूप से पढ़ा है, ताकि वह केवल मुख्य-परीक्षण में कही बातों तक सीमित न रहे, बल्कि गवाह की विश्वसनीयता और अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर भी प्रश्न शामिल कर सके।