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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 161

What matters may be proved in connection with proved statement relevant under

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः किसी साक्षी की ईमानदारी और निरंतरता का परीक्षण अदालत में जिरह से होता है। पर कुछ कथन—जैसे मृत्युपूर्व कथन या किसी पूर्व वाद में दी गई गवाही—इसलिए साक्ष्य में आ जाते हैं क्योंकि कथनकर्ता की अब जिरह संभव नहीं रहती (वह मर चुका हो सकता है, लापता हो सकता है, या पूर्व कार्यवाही समाप्त हो चुकी हो)। यह प्रावधान उस खाई को पाटता है: यह न्यायालय को ऐसे कथनों पर भी विरोधाभास, पुष्टि और विश्वसनीयता-परीक्षण के वही निष्पक्ष नियम लागू करने देता है, मानो अनुपस्थित व्यक्ति अदालत में उपस्थित होकर प्रत्यक्ष जिरह का सामना कर रहा हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार मृत्युपूर्व कथन या पुरानी गवाही साक्ष्य में पढ़ दी जाए, तो उसे आगे किसी प्रकार से चुनौती नहीं दी जा सकती।

    तथ्य: यह प्रावधान दोनों पक्षों को अन्य साक्ष्य लाने देता है ताकि उस कथन का खंडन, समर्थन, उस पर आक्षेप या उसकी विश्वसनीयता का बचाव किया जा सके—उसे लगभग जीवित जिरह जैसा ही माना जाता है।

  • मिथक: यह धारा साक्ष्य का कोई बिल्कुल नया प्रकार निर्मित करती है।

    तथ्य: यह नए साक्ष्य-श्रेणी नहीं जोड़ती; यह केवल पक्षकारों को धारा 26 या 27 के तहत पहले से ग्राह्य किए गए कथनों की विश्वसनीयता की परख करने देती है।