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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 19

Proof of admissions against persons making them, and by or on their behalf

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम पुराने Indian Evidence Act, 1872 की व्यवस्था से आता है और Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में आगे बढ़ाया गया है। तर्क सरल है: लोग अपने लाभ के लिए बाद में काम आने वाले स्व-हितकर कथन आसानी से गढ़ सकते हैं, इसलिए अदालतें सामान्यतः किसी को अपने ही पुराने शब्दों को अपने पक्ष में साक्ष्य के रूप में सिद्ध करने पर अविश्वास करती हैं। पर कुछ वास्तविक परिस्थितियाँ—मरणोपरांत कथन, समकालिक अभिलेख, मन:स्थिति दर्शाने वाले कथन, या अन्य कारणों से प्रासंगिक तथ्य—न्याय और विश्वसनीयता के चलते अपवाद ठहरती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने पुराने अधिनियम की धारा 21 के समान प्रावधान की व्याख्या करते हुए लगातार कहा है कि स्वीकारोक्तियाँ कर्ता के विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं, पर स्व-हितकर कथन तब तक अप्रमाण्य हैं जब तक वे मान्यता प्राप्त अपवादों में न आएँ। न्यायालयों ने ‘मन:स्थिति’ वाले अपवाद को सावधानी से लागू किया है, वैसा समकालिक वास्तविक आचरण अपेक्षित करते हुए जो कथन का सहारा देता हो, और ‘व्यवसायिक अभिलेख’ तर्क (जैसे जहाज़ कप्तान का उदाहरण) के जरिए नियमित रूप से रखे गए अभिलेखों को विश्वसनीय साक्ष्य माना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई व्यक्ति हमेशा अपने पिछले कथनों को अदालत में अपने पक्ष के समर्थन में प्रयोग कर सकता है।

    तथ्य: सामान्यतः नहीं; कानून स्व-हितकर स्वीकारोक्तियों को रोकता है, सिवाय उन तीन विशिष्ट परिस्थितियों के जिन्हें इस धारा में सूचीबद्ध किया गया है।

  • मिथक: स्वीकारोक्तियाँ केवल दीवानी मामलों—जैसे अनुबंध या संपत्ति विवाद—में ही प्रासंगिक हैं।

    तथ्य: स्वीकारोक्तियाँ व्यापक रूप से लागू होती हैं, दंड प्रक्रिया वाले मामलों सहित, जैसा कि चोरी और नकली मुद्रा वाले उदाहरणों से स्पष्ट है।

  • मिथक: किसी व्यक्ति की अपनी मन:स्थिति से जुड़ा कोई भी कथन वह हमेशा सिद्ध कर सकता है।

    तथ्य: ऐसे कथन तभी मान्य होंगे जब वे संबंधित समय पर या उसके निकट किए गए हों और ऐसे आचरण से समर्थित हों जो उन्हें विश्वसनीय बनाता हो; केवल कही-सुनी बातें पर्याप्त नहीं।