Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 18

Admissions by persons expressly referred to by party to suit

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः केवल व्यक्ति के अपने शब्द ही उसकी स्वीकृति (admission) माने जाते हैं। परंतु यदि कोई जानबूझकर किसी विशिष्ट तीसरे व्यक्ति के ज्ञान पर भरोसा करने के लिए कहता है, तो क़ानून इसे ऐसे मानता है कि उस व्यक्ति ने उस तीसरे के कथन को अपना लिया, क्योंकि उसने उसकी विश्वसनीयता की वकालत की। यह नियम भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Section 20) से चला आ रहा है और इसीलिए बनाया गया है कि जो पक्षकार स्वयं किसी जानकारी की पैरवी करके दूसरों को वहाँ भेजे, वह बाद में उस जानकारी की ज़िम्मेदारी से नहीं बच सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आम नियम यह है कि केवल पक्षकार के अपने प्रत्यक्ष शब्द ही उसके विरुद्ध स्वीकृति (admission) के रूप में प्रयोज्य होते हैं।

    तथ्य: परंतु यदि कोई पक्षकार किसी को जानकारी के लिए किसी तीसरे व्यक्ति के पास विशेष रूप से भेज देता है, तो उस तीसरे का कथन भी इस नियम के तहत उसी पक्षकार की स्वीकृति (admission) माना जा सकता है।

  • मिथक: यह किसी बातचीत में यूँ ही उल्लेख कर दिए गए किसी भी अनियत व्यक्ति पर लागू नहीं होता।

    तथ्य: यह तभी लागू होता है जब संदर्भण स्पष्ट और विशिष्ट हो, अर्थात पक्षकार विवादित matter पर जानकारी के स्रोत के रूप में उसी विशेष व्यक्ति की ओर साफ़-साफ़ और जानबूझकर संकेत करे।