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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 38

Fraud or collusion in obtaining judgment, or incompetency of Court, may be proved

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 44 के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है। निर्णय, आदेश और डिक्री सामान्यतः उन धाराओं के तहत, जो उनकी प्रासंगिकता बताती हैं, कुछ तथ्यों के प्रबल या यहाँ तक कि निश्चयात्मक प्रमाण माने जाते हैं। परंतु जो निर्णय अदालत को छल से गुमराह करके, या पक्षकारों की गुप्त साठगांठ से मनचाहा परिणाम पाने हेतु, या ऐसे न्यायालय द्वारा दिया गया हो जिसके पास क्षेत्राधिकार ही न हो, उसे बाद की कार्यवाही में किसी व्यक्ति पर बाध्यकारी या भ्रामक नहीं बनने दिया जाना चाहिए। इसलिए कानून प्रभावित पक्ष को अलग से नया मुकदमा दायर करने को बाध्य करने के बजाय, उसी बाद की कार्यवाही में उस निर्णय की वैधता पर प्रश्न उठाने की अनुमति देता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पुरानी धारा 44 के अंतर्गत न्यायालयों ने माना कि यह प्रावधान केवल तीन संकीर्ण आधारों पर निर्णय पर पार्श्व (कोलैटरल) हमला करने देता है: न्यायालय का क्षेत्राधिकार न होना, धोखाधड़ी, या मिलीभगत — यह पहले के निर्णय के गुण-दोष पर दोबारा बहस करने का सामान्य निमंत्रण नहीं है। धोखाधड़ी को ठोस रूप से निवेदित और सिद्ध करना होगा, केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं; पहले निर्णय में कानून या तथ्य की सामान्य भूलें पर्याप्त नहीं हैं। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘मिलीभगत’ का आशय किसी तीसरे व्यक्ति के प्रतिकूल मनचाहा परिणाम पाने के लिए पक्षकारों के बेईमान समझौते से है, और न्यायालय की ‘क्षमता’ का अर्थ सख्ती से क्षेत्राधिकार से है, न कि निर्णय की शुद्धता से।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार अदालत में कोई निर्णय सिद्ध हो जाए, तो उसे फिर कभी प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता।

    तथ्य: यह धारा विशेष रूप से पक्षकार को यह दिखाकर सिद्ध किए गए निर्णय को चुनौती देने की अनुमति देती है कि वह बिना क्षेत्राधिकार के दिया गया था या धोखाधड़ी/मिलीभगत से प्राप्त किया गया था।

  • मिथक: आप केवल इसलिए किसी भी पुराने निर्णय को फिर से खोल सकते हैं कि आपको लगता है वह ग़लत तय हुआ था।

    तथ्य: न्यायालयों ने इस प्रावधान को संकीर्ण रूप में पढ़ा है — केवल क्षेत्राधिकार का अभाव, धोखाधड़ी, या मिलीभगत के आधार पर ही निर्णय को चुनौती दी जा सकती है; तथ्य या कानून की साधारण त्रुटियाँ पर्याप्त नहीं हैं।