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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 36

Relevancy and effect of judgments, orders or decrees, other than those mentioned in

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अदालतों को प्रायः लोक-अधिकारों के तथ्यों पर निर्णय देना पड़ता है — जैसे कोई सड़क, नदी-तट या बाज़ार सबके लिए खुला है या नहीं। ऐसे तथ्य अलग‑अलग व्यक्तियों के बीच चलने वाले भिन्न मुकदमों में बार‑बार परखे जाते हैं। यह प्रावधान इन सार्वजनिक प्रश्नों पर हुए पूर्ववर्ती न्यायालयी निर्णयों को संबद्ध पृष्ठभूमि-साक्ष्य के रूप में ग्रहण करने देता है, यह मानते हुए कि किसी समुदाय की अपने सार्वजनिक स्थलों के बारे में समझ अनेक मामलों से बनती है, और साथ ही उन लोगों की रक्षा भी करता है जो पहले वाले मुकदमे के पक्षकार नहीं थे, ताकि वे उस निर्णय से बँध न जाएँ जिसके विरुद्ध उन्हें दलील देने का अवसर ही न मिला था।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

यह नियम पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 42 से आया है, और भारतीय न्यायालयों ने लंबे समय से माना है कि ऐसे निर्णय सार्वजनिक अधिकार के संबंध में सामान्य ख्याति या प्रतिष्ठा दर्शाने वाले संबद्ध तथ्य के रूप में ग्राह्य हैं, परन्तु उन्हें कभी भी उस व्यक्ति के विरुद्ध अन्तिम या बाध्यकारी प्रमाण नहीं माना जाता जो उस पूर्ववर्ती मुकदमे का पक्षकार नहीं था। न्यायालयों ने रेखांकित किया है कि ऐसे निर्णयों को दी जाने वाली महत्व–भारता इस बात पर निर्भर करती है कि कितने लोगों ने उस पहले के निर्णय को स्वीकार किया और वह समय के साथ बिना चुनौती के कितना कायम रहा।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि किसी लोक‑स्वरूप के मुद्दे पर अदालत ने एक बार निर्णय दे दिया, तो वही निर्णय अपने‑आप भविष्य के हर ऐसे मामले में लागू होकर पक्ष को जिता देता है।

    तथ्य: कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि ऐसे निर्णय निश्चयात्मक (conclusive) प्रमाण नहीं होते — वे मात्र प्रासंगिक साक्ष्य हैं, जिन्हें नई अदालत अन्य सब बातों के साथ तोल‑मोल कर देख सकती है।

  • मिथक: यह नियम हर प्रकार के मामले में दिए गए सभी पुराने निर्णयों पर लागू होता है।

    तथ्य: यह विशेष रूप से उन्हीं निर्णयों पर लागू होता है जो लोक-स्वरूप के विषयों (जैसे सार्वजनिक मार्ग का अधिकार, चुंगी/शुल्क, या रीति‑रिवाज) से संबंधित हों, न कि व्यक्तियों के बीच निजी विवादों पर।