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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 39

Opinions of experts

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अदालतों में विधि-प्रशिक्षित न्यायाधीश होते हैं, न कि चिकित्सा, रसायन, हस्तलेख विश्लेषण या संगणक न्यायवैज्ञानिक विज्ञान के विशेषज्ञ। फिर भी अनेक विवाद—विष द्वारा मृत्यु, पागलपन का प्रतिरक्षा-तर्क, जाली दस्तावेज़, हैक हुए खाते—ऐसे तकनीकी तथ्यों पर टिके होते हैं जिनका आकलन न्यायाधीश अकेले नहीं कर सकते। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (इस धारा का पूर्ववर्ती प्रावधान, धारा 45) से ही भारतीय विधि ने विशेष कौशल वाले व्यक्तियों को अपना व्यावसायिक मत देकर अदालत की सहायता करने की अनुमति दी है, जबकि अंतिम निर्णय न्यायाधीश के पास ही रहता है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विशेषज्ञों पर जोड़ा गया प्रावधान डिजिटल युग को परिलक्षित करता है और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में हुए संशोधनों के अनुरूप है, जिनके तहत प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षकों का औपचारिक तंत्र बनाया गया।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 45) के तहत, सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार माना कि विशेषज्ञ मत मात्र परामर्शात्मक होता है, बाध्यकारी नहीं—न्यायाधीश को उस मत के पीछे के कारणों का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए (State of Himachal Pradesh v. Jai Lal, 1999)। Ramesh Chandra Agrawal v. Regency Hospital (2009) में न्यायालय ने रेखांकित किया कि विशेषज्ञ के पास अध्ययन या अनुभव से अर्जित विशिष्ट कौशल होना चाहिए और उसके मत का सुदृढ़ तर्कों से समर्थित होना आवश्यक है। हस्तलेख साक्ष्य के संदर्भ में विशेष रूप से, न्यायालयों ने चेताया है कि मात्र विशेषज्ञ मत कमजोर साक्ष्य है और पुष्टि मिलने पर अधिक सुरक्षित होता है (Murari Lal v. State of M.P., 1980)। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए, न्यायालयों ने ऐसे विशेषज्ञ मतों को डिजिटल अभिलेखों के प्रमाणन व प्रमाणीकरण की आवश्यकताओं से जोड़ा है, जिसे Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) जैसे मामलों में मान्यता दी गई, ताकि संगणक-आधारित साक्ष्य की विश्वसनीयता सुनिश्चित हो, इससे पहले कि उस पर विशेषज्ञ मत पर विचार किया जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: विशेषज्ञ का मत अपने-आप मामले का निर्णय कर देता है।

    तथ्य: अदालतों ने माना है कि विशेषज्ञ मत केवल परामर्शात्मक होता है; न्यायाधीश को उसके पीछे की दलीलों का मूल्यांकन करना चाहिए और वह उससे असहमत भी हो सकता है।

  • मिथक: केवल हस्तलेख विशेषज्ञ की गवाही से ही जालसाजी सिद्ध हो जाती है।

    तथ्य: अदालतों ने, जिसमें Murari Lal v. State of M.P. में सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, चेताया है कि हस्तलेख संबंधी मत पर अन्य साक्ष्यों से पुष्टि होने पर ही अधिक भरोसा करना उचित है।

  • मिथक: कोई भी कंप्यूटर-जानकार व्यक्ति इस धारा के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर ‘विशेषज्ञ’ गवाही दे सकता है।

    तथ्य: उपधारा (2) स्पष्ट रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79A के अंतर्गत अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के परीक्षक की ओर संकेत करती है, न कि मात्र किसी तकनीकी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति की ओर।