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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 78

Person arrested to be brought before Court without delay

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम अवैध निरोध के विरुद्ध लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा को आगे बढ़ाता है—जिसकी जड़ें दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 76 में हैं, जो स्वयं सामान्य विधि (कॉमन-लॉ) की मनमानी हिरासत के ख़िलाफ़ सुरक्षा को प्रतिबिंबित करती थी। यह संविधान के अनुच्छेद 22(2) से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है, जो सुनिश्चित करता है कि गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए। उद्देश्य यह है कि पुलिस किसी व्यक्ति को न्यायिक निगरानी के बिना अनिश्चितकाल तक हिरासत में न रख सके, और उसे शीघ्र ऐसे न्यायालय तक पहुँच मिले जो गिरफ़्तारी की वैधता की जाँच कर सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने परंपरागत रूप से पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 76 CrPC) को संविधान के अनुच्छेद 22(2) के साथ पढ़ते हुए इसे अनिवार्य व गैर-समझौतापूर्ण सुरक्षा माना है। Khatri v. State of Bihar तथा D.K. Basu v. State of West Bengal जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष तत्क्षण पेशी हिरासत में दुर्व्यवहार और अवैध निरोध को रोकने के लिए आवश्यक है, और 24 घंटे से अधिक की कोई भी बिना स्पष्टीकरण वाली देरी (यात्रा समय को छोड़कर) निरोध को अवैध बना देती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस जाँच पूरी करने के लिए जितनी देर चाहे, गिरफ़्तार व्यक्ति को अदालत में पेश करने से पहले हिरासत में रख सकती है।

    तथ्य: क़ानून यह अनिवार्य करता है कि गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर, यात्रा समय को छोड़कर, न्यायालय के समक्ष पेशी हो; धारा 78 के तहत जाँच की ज़रूरतें इस समय-सीमा को नहीं बढ़ातीं।

  • मिथक: यह 24 घंटे वाला नियम केवल बिना वारंट की गई गिरफ़्तारियों पर लागू होता है।

    तथ्य: धारा 78 विशेष रूप से वारंट पर की गई गिरफ़्तारी से संबंधित है, हालांकि इसी तरह का 24 घंटे का सिद्धांत (संविधान का अनुच्छेद 22(2)) सामान्य रूप से अधिकांश गिरफ़्तारियों पर व्यापक रूप से लागू होता है।