Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 77
Notification of substance of warrant
The police officer or other person executing a warrant of arrest shall notify the substance thereof to the person to be arrested, and, if so required, shall show him the warrant.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु लंबे समय से चले आ रहे नियम (पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 75) को आगे बढ़ाता है। गिरफ़्तारी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में गम्भीर दख़ल है, इसलिए क़ानून पारदर्शिता चाहता है: व्यक्ति को यह जाने बिना नहीं उठाया जाना चाहिए कि कारण क्या है, और उसे यह जाँचने में सक्षम होना चाहिए कि गिरफ़्तारी मनमानी या अधिकारी की व्यक्तिगत इच्छा पर नहीं, बल्कि वैध न्यायालयी आदेश से समर्थित है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, जैसे Joginder Kumar v. State of U.P. (1994) तथा बाद के दिशा-निर्देश D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) में, यह रेखांकित किया है कि गिरफ़्तारी के आधारों की जानकारी देना संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक पहलू है। यद्यपि ये मामले व्यापक रूप से गिरफ़्तारी प्रक्रिया पर केंद्रित थे, वे पुष्ट करते हैं कि इस तरह के प्रावधान मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि अवैध निरोध के विरुद्ध सुरक्षा हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह ठीक नहीं है कि पुलिस को वारंट होने पर कुछ भी समझाने की ज़रूरत नहीं—वे बस आपको गिरफ़्तार कर लें।
तथ्य: वारंट होने पर भी, क़ानून पुलिस से अपेक्षा करता है कि वे व्यक्ति को वारंट का सार (मुख्य कारण) बताएँ और अनुरोध करने पर उसे दिखाएँ।
मिथक: आप कभी भी वास्तविक वारंट नहीं देख सकते—यह कथन ग़लत है।
तथ्य: गिरफ़्तार किया जा रहा व्यक्ति वारंट दिखाने का अधिकार रखता है, और माँग करने पर अधिकारी उसे वारंट अवश्य दिखाएगा।