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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 181

Statements to police and use thereof

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान एक दीर्घकालिक नियम (मूलतः पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 162) को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य यह है कि पुलिस के समक्ष दिए गए बयान—जो अक्सर अनौपचारिक रूप से, बिना शपथ, बिना जिरह और बिना पर्याप्त सुरक्षा के लिखे जाते हैं—को भरोसेमंद मुकदमेबाजी साक्ष्य न माना जाए। औपनिवेशिक दौर के अनुभव ने दिखाया कि पुलिस बयान जबरन दिलवाए गए, बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए या ग़लत रिकॉर्ड किए गए हो सकते हैं; इसलिए विधायकों ने उनके उपयोग को सख्ती से केवल असंगतियाँ पकड़ने तक सीमित किया, ताकि अभियुक्त के गवाहों को चुनौती देने के अधिकार की रक्षा हो और पुलिस बयानों को दोषसिद्धि का आसान रास्ता न बनने दिया जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Tahsildar Singh v. State of Uttar Pradesh (1959) ने स्पष्ट किया कि पुलिस बयान में ‘उल्लेख का न होना’ कब वास्तविक ‘विरोधाभास’ बनता है—केवल वही चूकें जो इतनी महत्वपूर्ण हों कि उनसे यह संकेत मिले कि गवाह अदालत में कुछ भिन्न कह रहा है, वे ही योग्य हैं; हर छूटी हुई बारीकी नहीं। न्यायालय लगातार मानते आए हैं कि पुलिस बयान सubstantive evidence नहीं हैं और गवाह की पुष्टि के लिए कभी प्रयुक्त नहीं हो सकते; उनका उपयोग केवल विरोधाभास दिखाने के लिए, या सीमित पुनः-परीक्षण में पहले से उठाए गए विरोधाभास की व्याख्या भर के लिए हो सकता है। यह BNSS का प्रावधान (अपने पूर्ववर्ती की तरह) उसी न्यायिक दृष्टिकोण को सीधे स्पष्टीकरण खंड में संहिताबद्ध करता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: जाँच के दौरान दर्ज किया गया पुलिस बयान अदालत में तथ्यों के पुख्ता साक्ष्य के रूप में पढ़ा जा सकता है।

    तथ्य: इसे किसी भी रूप में सारगर्भित साक्ष्य (substantive evidence) नहीं माना जा सकता—इसे केवल तब उपयोग किया जा सकता है जब गवाह अदालत में कुछ अलग कह दे, तो उसे विरोधाभास दिखाने के लिए।

  • मिथक: पुलिस बयान और अदालत की गवाही में कोई भी छोटा फर्क अपने-आप झूठ या विरोधाभास माना जाएगा।

    तथ्य: न्यायालय यह परखते हैं कि छूट या अंतर कितना महत्वपूर्ण और प्रसंगानुकूल है; तुच्छ या सहज-समझाई जा सकने वाली खामियाँ स्वतः विरोधाभास नहीं मानी जातीं।

  • मिथक: मृत्युपूर्व कथन और जिन बयानों से वस्तुओं की बरामदगी होती है, वे भी इस नियम से रोके जाते हैं।

    तथ्य: उपधारा (2) इन्हें विशेष रूप से अपवाद देती है—ये Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 के तहत साध्य साक्ष्य (substantive evidence) के रूप में प्रयोज्य हैं, साधारण पुलिस बयानों के विपरीत।