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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 23

Sentences which Magistrates may pass

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय आपराधिक न्यायालय एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था में संगठित हैं, ताकि गम्भीर अपराध वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों द्वारा देखे जाएँ, जबकि लघु अपराध निचली अदालतों में शीघ्र निपटाए जाएँ। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 29 से संशोधनों सहित आगे बढ़ाई गई इस व्यवस्था में, प्रत्येक स्तर के मजिस्ट्रेट के लिए दंड की सीमा तय की गई है ताकि निचली अदालतें अपनी क्षमता से अधिक दंड न दें, और न्याय प्रणाली में समानुपातिकता व नियंत्रण बने रहें। वर्ष 2023 की संहिता ने ‘सामुदायिक सेवा’ को दंड के एक नए विकल्प के रूप में जोड़ा है, जो केवल कारावास या जुर्माने के बजाय पुनर्स्थापनात्मक व पुनर्वासोन्मुख न्याय की आधुनिक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती, समान शब्दांकन वाली दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 29 के अंतर्गत, न्यायालयों ने लगातार माना कि कोई मजिस्ट्रेट अपनी श्रेणी के लिए निर्धारित दंड‑सीमा से अधिक नहीं जा सकता, और सीमा से परे दी गई सज़ा अवैध है तथा अपील या पुनरीक्षण में निरस्त की जा सकती है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया कि जब अनेक अपराध एक साथ सुने जाते हैं, तो धारा 31 CrPC (जिसका समान प्रावधान अब BNSS में परिलक्षित है) के अंतर्गत समेकित सज़ा भी इन श्रेणीवार सीमाओं का सम्मान करेगी, जब तक कि कोई विशिष्ट समेकन‑सम्बन्धी प्रावधान लागू न हो। BNSS नवीन होने के कारण नई ‘सामुदायिक सेवा’ धारा पर विशेष न्यायिक व्याख्या अभी व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी मजिस्ट्रेट किसी अपराध के लिए कानून में वर्णित कोई भी दंड दे सकता है।

    तथ्य: प्रत्येक श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अधिकतम सज़ा‑सीमा निर्धारित है; भले ही कानून अधिक सज़ा की अनुमति देता हो, मजिस्ट्रेट अपनी निर्धारित सीमा से ऊपर नहीं जा सकता।

  • मिथक: सामुदायिक सेवा जुर्माने या अनौपचारिक दंड के समान ही होती है।

    तथ्य: सामुदायिक सेवा एक औपचारिक न्यायालय‑आदेशित दंड है, जिसमें जनहित के लिए बिना पारिश्रमिक का काम कराया जाता है; यह न तो जुर्माना है और न ही मात्र चेतावनी।