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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 24

Sentence of imprisonment in default of fine

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जुर्माना एक सामान्य दंड है, पर जब कोई भुगतान से इन्कार कर दे या असफल रहे, तो अदालती प्रवर्तन का तरीका चाहिए। डिफ़ॉल्ट कारावास उसी प्रवर्तन साधन के रूप में काम करता है। किंतु चूँकि मजिस्ट्रेटों की सजा देने की शक्ति उनके पद के अनुसार सीमित होती है, यह प्रावधान (पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 30 से आगे बढ़ाया गया) सुनिश्चित करता है कि डिफ़ॉल्ट कारावास के नाम पर न तो मजिस्ट्रेट अपनी वास्तविक अधिकार-सीमा लांघें, न ही जुर्माना छिपे तौर पर अत्यधिक कारावास में बदल जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

समान पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 30, CrPC 1973) के तहत न्यायालयों ने लगातार माना कि डिफ़ॉल्ट सजा केवल जुर्माना वसूल कराने के लिए है, अतिरिक्त दंड देने के लिए नहीं, और जब साथ में वास्तविक (सबसटैंटिव) कारावास हो तो एक-चौथाई की सीमा का कड़ाई से पालन होना चाहिए। मजिस्ट्रेट की क्षमता से अधिक या उस एक-चौथाई नियम की अवहेलना करने वाली डिफ़ॉल्ट सजाएँ न्यायालयों ने निरस्त की हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि यदि कोई जुर्माना नहीं चुका पाए तो मजिस्ट्रेट मनचाहा जितना अतिरिक्त कारावास जोड़ सकते हैं।

    तथ्य: कानून डिफ़ॉल्ट कारावास पर सख्त सीमा लगाता है — यह मजिस्ट्रेट की सामान्य सजा देने की शक्ति से अधिक नहीं हो सकता, और यदि मुख्य दंड के रूप में कारावास भी दिया गया है, तो डिफ़ॉल्ट अवधि उस कारावास की एक-चौथाई से अधिक नहीं हो सकती।

  • मिथक: यह कहना गलत है कि जुर्माना न चुकाने पर मिलने वाला डिफ़ॉल्ट कारावास पूरी तरह अलग, असीमित दंड है।

    तथ्य: कानूनी रूप से यह जुर्माने के भुगतान को प्रोत्साहित करने का प्रवर्तन-उपकरण है, न कि बिना सीमा वाला स्वतंत्र अतिरिक्त दंड।