Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 25
Sentence in cases of conviction of several offences at one trial
(1) When a person is convicted at one trial of two or more offences, the Court may, subject to the provisions of section 9 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, sentence him for such offences, to the several punishments prescribed therefor which such Court is competent to inflict and the Court shall, considering the gravity of offences, order such punishments to run concurrently or consecutively.
(2) In the case of consecutive sentences, it shall not be necessary for the Court by reason only of the aggregate punishment for the several offences being in excess of the punishment which it is competent to inflict on conviction of a single offence, to send the offender for trial before a higher Court: Provided that—
(a) in no case shall such person be sentenced to imprisonment for a longer period than twenty years;
(b) the aggregate punishment shall not exceed twice the amount of punishment which the Court is competent to inflict for a single offence.
(3) For the purpose of appeal by a convicted person, the aggregate of the consecutive sentences passed against him under this section shall be deemed to be a single sentence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 31 से विकसित हुआ है, जिसने एक व्यावहारिक समस्या का समाधान किया था: सीमित दंडाधिकार वाले न्यायालय (जैसे मजिस्ट्रेट) अक्सर अनेक संबद्ध अपराधों की एक साथ सुनवाई करते हैं; यदि कुल सजा को उनके एक-अपराध अधिकार तक कठोरता से बाँध दिया जाए, तो बहु-अपराध वाले गम्भीर आचरण को अपर्याप्त दंड मिलेगा। यह कानून दक्षता और आनुपातिकता के लिए सजाओं को एकत्र करने की अनुमति देता है, साथ ही अति-दंड से बचाने हेतु सीमा-रेखाएँ जोड़ता है (20 वर्ष की सीमा, और एक-अपराध दंड की दुगुनी से अधिक नहीं), तथा अपील में खंडित होने से रोकने के लिए ‘एकल सजा’ का विधिक कल्पनात्मक प्रावधान करता है। 2023 की BNSS ने यह स्पष्ट निर्देश जोड़ा कि समवर्ती बनाम पर्यायक्रमिक सजा चुनते समय न्यायालय ‘अपराधों की गंभीरता’ अवश्य तौले — यानी एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक प्रथा को विधि में प्रत्यक्ष आदेश की तरह संहिताबद्ध कर दिया गया।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती धारा 31 CrPC के अंतर्गत, न्यायालयों (जिसमें Mohd. Akhtar Hussain v. Assistant Collector of Customs तथा बाद में V.K. Bansal v. State of Haryana जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय भी) ने माना कि समवर्ती या पर्यायक्रमिक सजा का चुनाव न्यायिक विवेक का विषय है, जिसे अपराधों के स्वरूप के आलोक में प्रयोग किया जाना चाहिए, विशेषकर बहु-चेक-बाउंस या आर्थिक अपराधों के मामलों में। न्यायालयों ने चेताया कि जहाँ अपराध एक ही लेन-देन या आचरण-क्रम से उपजे हों, वहाँ सभी सजाओं को यांत्रिक ढंग से पर्यायक्रमिक चलाने का आदेश न दिया जाए। पुराने उपबंध में संयुक्त कारावास की अधिकतम सीमा 14 वर्ष थी; BNSS 2023 ने इस छत को 20 वर्ष तक बढ़ाया, और पहली बार स्पष्ट रूप से अपराधों की गंभीरता पर विचार करने का निर्देश देकर उस सिद्धांत को विधि-ग्रंथ में उतार दिया जिसकी पहले की न्यायिक दृष्टांत पहले ही वकालत कर रहे थे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि बहु-अपराधों की संयुक्त सजा, एक-अपराध की सामान्य सीमा से अधिक हो जाए, तो न्यायालय को हमेशा मामला उच्चतर न्यायालय को भेजना अनिवार्य है।
तथ्य: कानून साफ कहता है कि यह आवश्यक नहीं है — जब तक 20 वर्ष की सीमा और ‘एकल-अपराध सजा की दुगुनी’ वाली सीमा का पालन हो रहा है, तब तक वही न्यायालय मामले को निपटा सकता है।
मिथक: न्यायाधीश बिना किसी सीमा के सभी सजाओं को लगातार जोड़कर चला सकते हैं।
तथ्य: कड़ी सीमाएँ हैं: कुल कारावास कभी 20 वर्ष से अधिक नहीं हो सकता, और किसी एक अपराध पर न्यायालय जो अधिकतम दे सकता है उसके दुगुने से अधिक भी नहीं; साथ ही, समवर्ती बनाम पर्यायक्रमिक का चुनाव करने से पहले न्यायालय को अपराधों की गंभीरता अवश्य तौलनी है।
मिथक: पर्यायक्रमिक सजाएँ अपील के लिए अलग-अलग, अनेक स्वतंत्र सजाओं की तरह गिनी जाती हैं, जिससे अपीलें जटिल हो जाती हैं।
तथ्य: कानून अपील के प्रयोजन के लिए सभी पर्यायक्रमिक सजाओं को मिलाकर एक ही एकल सजा मानता है, जिससे प्रक्रिया सरल हो जाती है।