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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 148

Dispersal of assembly by use of civil force

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान औपनिवेशिक काल के दंगा-नियंत्रण कानून से विकसित हुआ है (पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 127–128, जिसकी जड़ें 19वीं सदी के पुलिस क़ानूनों में हैं) जिसका उद्देश्य अधिकारियों को उग्र भीड़ से निपटने के लिए वैधानिक और क्रमिक उपाय देना था, ताकि स्थिति गंभीर हिंसा तक न पहुँचे। विचार यह है कि पहले भीड़ को स्पष्ट चेतावनी और शांतिपूर्वक हटने का अवसर दिया जाए, और उसी के उल्लंघन पर ही बल की अनुमति हो—सार्वजनिक व्यवस्था और लोगों के शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने पूर्ववर्ती प्रावधान (CrPC की धारा 129) की व्याख्या करते हुए लगातार माना है कि तितर-बितर करना और बल का प्रयोग आनुपातिक होना चाहिए और केवल उतना ही जितना जमाव को तितर-बितर करने के लिए आवश्यक हो—दंडात्मक या अतिशय नहीं। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि इस शक्ति का उपयोग करने से पहले जमाव वास्तव में ‘अवैध’ हो या सार्वजनिक शांति के लिए खतरा हो; शांतिपूर्ण, वैध प्रदर्शन इससे अलग हैं और संरक्षित हैं। आवश्यकता से अधिक बल का प्रयोग न्यायसंगत कार्यवाही के योग्य ठहराया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस इस शक्ति का इस्तेमाल किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ कर सकती है जो उन्हें पसंद न हो।

    तथ्य: यह कानून सिर्फ ‘अवैध जमाव’ या ऐसी भीड़ पर लागू होता है जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो—शांतिपूर्ण, वैध जमाव संरक्षित हैं और न्यायालयों ने अहिंसक प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध इस शक्ति के दुरुपयोग को निरस्त किया है।

  • मिथक: एक बार तितर-बितर होने का आदेश दे दिया जाए, तो पुलिस तुरंत असीमित बल का प्रयोग कर सकती है।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि बल का प्रयोग आनुपातिक होना चाहिए और केवल उतना ही जितना जमाव को तितर-बितर करने के लिए आवश्यक हो—अतिशय या दंडात्मक नहीं।