Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 147
Enforcement of order of maintenance
A copy of the order of maintenance or interim maintenance and expenses of proceedings, as the case may be, shall be given without payment to the person in whose favour it is made, or to his guardian, if any, or to the person to whom the allowance for the maintenance or the allowance for the interim maintenance and expenses of proceeding, as the case may be, is to be paid; and such order may be enforced by any Magistrate in any place where the person against whom it is made may be, on such Magistrate being satisfied as to the identity of the parties and the non-payment of the allowance, or as the case may be, expenses, due. A.—Unlawful assemblies
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भरण-पोषण के आदेश (ऐसी पत्नियों, बच्चों या माता-पिता के लिए जो अपने भरण-पोषण में असमर्थ हों) निरर्थक हो जाते हैं यदि भुगतानकर्ता किसी अन्य अधिकार-क्षेत्र में जाकर छिप जाए और प्रवर्तन न हो सके। दंड प्रक्रिया संहिता की पुरानी धारा 128 से आगे बढ़ाए गए इस प्रावधान से लाभार्थी को आदेश की निःशुल्क प्रमाणित प्रति मिलती है और प्रवर्तन केवल उसी अदालत तक सीमित नहीं रहता जिसने आदेश दिया — जहाँ भी चूककर्ता मिले वहाँ का कोई भी मजिस्ट्रेट कार्रवाई कर सकता है, जिससे मात्र जगह बदलकर भुगतान से बच निकलने की कोशिश विफल होती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने लगातार माना है कि आदेश की निःशुल्क प्रति देना महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता है, क्योंकि अनेक निर्धन भरण-पोषण पाने वाले न्यायालय शुल्क देने में असमर्थ होते हैं। पूर्व धारा 128 CrPC के तहत न्यायिक व्याख्या ने रेखांकित किया कि प्रवर्तन करने वाले मजिस्ट्रेट को केवल पहचान और अदायगी न होने की तस्दीक़ करनी है — मूल भरण-पोषण आदेश के गुण-दोष को प्रवर्तन के चरण में फिर से नहीं खोला जा सकता, जिससे प्रक्रिया तीव्र रहती है और लाभार्थी को उसी मुद्दे पर लम्बी मुकदमेबाज़ी से सुरक्षा मिलती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि चूककर्ता किसी दूसरे शहर चला जाए तो आपको नया मुकदमा दायर करना होगा।
तथ्य: उसी भरण-पोषण आदेश का प्रवर्तन जहाँ भी चूककर्ता मिले वहाँ का कोई भी मजिस्ट्रेट करा सकता है; नया मामला दायर करने की आवश्यकता नहीं है।
मिथक: भरण-पोषण आदेश की प्रति पाने के लिए प्राप्तकर्ता को न्यायालय शुल्क देना पड़ता है।
तथ्य: कानून विशेष रूप से निर्देश देता है कि यह प्रति निःशुल्क दी जाए।
मिथक: प्रवर्तन करने वाला मजिस्ट्रेट फिर से यह जाँच सकता है कि भरण-पोषण दिया ही जाना चाहिए था या नहीं।
तथ्य: प्रवर्तन करने वाले मजिस्ट्रेट की भूमिका पहचान और अदायगी न होने की पुष्टि तक सीमित है; मूल निर्णय को दोबारा नहीं खोला जाता।