Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 29
Exclusion of acts which are offences independently of harm caused
The exceptions in sections 25, 26 and 27 do not extend to acts which are offences independently of any harm which they may cause, or be intended to cause, or be known to be likely to cause, to the person giving the consent, or on whose behalf the consent is given. Illustration. Causing miscarriage (unless caused in good faith for the purpose of saving the life of the woman) is an offence independently of any harm which it may cause or be intended to cause to the woman. Therefore, it is not an offence “by reason of such harm”; and the consent of the woman or of her guardian to the causing of such miscarriage does not justify the act.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता, 1860 की पुरानी धारा 91 के तर्क को आगे बढ़ाता है। विधायकों ने माना कि कई स्थितियों में सहमति से दायित्व हट सकता है (जैसे जोखिमयुक्त चिकित्सीय प्रक्रिया), क्योंकि वहां कानून का उद्देश्य व्यक्ति को क्षति से बचाना है और व्यक्ति ने जोखिम स्वीकार किया है। पर कुछ कृत्य व्यापक जनहित के कारण अपराध घोषित होते हैं—गर्भस्थ जीवन की रक्षा, सार्वजनिक नैतिकता, या तृतीय पक्षों की सुरक्षा—सिर्फ सहमति देने वाले को ढालना ही लक्ष्य नहीं होता। ऐसे मामलों में सहमति के आधार पर आपराधिक दायित्व मिटा देना कानून के असली उद्देश्य को विफल कर देगा। अवैध गर्भपात इसका पारंपरिक उदाहरण रहा: गर्भवती स्त्री की सहमति होने पर भी कृत्य अवैध रहता है क्योंकि कानून का लक्ष्य स्वयं उस कृत्य को रोकना है, न कि केवल उसे होने वाली हानि।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने परंपरागत रूप से समकक्ष आईपीसी धारा 91 का संकीर्ण और सुसंगत अर्थ लिया है: सहमति-अपवाद (जैसे आईपीसी की धाराएँ 87–89, जो अब बीएनएस की धाराएँ 25–27 हैं) केवल उन्हीं स्थितियों तक सीमित हैं जहाँ कृत्य को अपराध मानने का एकमात्र आधार सहमति देने वाले को होने वाली हानि हो। न्यायालयों ने इस तर्क को विशेषकर अवैध गर्भपात/गर्भपात-जन्य अपराधों में लागू किया है, और माना है कि स्त्री की सहमति किसी अवैध गर्भपात करने वाले को दायित्व से नहीं बचाती, क्योंकि कानून का अपराधीकरण संभावित जीवन और जनस्वास्थ्य की रक्षा हेतु है, न कि केवल स्त्री को स्वयं होने वाली हानि से बचाने के लिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि कोई व्यक्ति अपने ही शरीर के साथ होने वाली किसी बात के लिए सहमति दे दे, तो वह कृत्य कभी अपराध नहीं हो सकता।
तथ्य: सहमति केवल उन्हीं कृत्यों को माफ करती है जो सिर्फ सहमति देने वाले व्यक्ति को होने वाली हानि के कारण अपराध हैं। यदि कोई कृत्य अन्य कारणों से भी अवैध है—जैसे गर्भस्थ शिशु की रक्षा या जनहित—तो सहमति उसे वैध नहीं बनाती।
मिथक: गर्भपात वाला उदाहरण यह दर्शाता है कि सभी गर्भसमापन अवैध हैं।
तथ्य: यह उदाहरण केवल सिद्धांत की कार्यप्रणाली दिखाता है; स्त्री का जीवन बचाने के लिए सद्भावना से किया गया गर्भसमापन विधिवत अपवाद है और वैध रहता है, और अन्य गर्भसमापन कानून अलग से बताते हैं कि कब समापन स्वीकृत है।