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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 30

Act done in good faith for benefit of a person without consent

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान मूल भारतीय दण्ड संहिता (Section 92) से आया है, जिसे 19वीं सदी में उन आपातस्थितियों के लिए तैयार किया गया था जहाँ चिकित्सक, बचावकर्मी या राहगीर को जीवन बचाने या गम्भीर हानि रोकने के लिए बिना अनुमति लिए तत्काल कार्य करना पड़ता है। यह मानता है कि हर स्थिति में सहमति की अनिवार्यता कभी-कभी जीवन की क़ीमत पर पड़ सकती है, इसलिए यह सद्भावना में किए गए आपातकालीन कार्यों को ढाल देता है — जबकि दुरुपयोग से बचाने के लिए जानबूझकर की गई हत्या या असंबद्ध हानि को सावधानी से बाहर रखता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने परम्परागत रूप से इस प्रावधान (Section 92 IPC) को उससे पहले वाले ‘सहमति’ अपवादों से निकटता से जोड़ा है, और रेखांकित किया है कि ‘सद्भावना’ का अर्थ केवल अच्छे इरादे का दावा नहीं, बल्कि वास्तविक सावधानी और ध्यान है। अदालतों ने इसे मुख्यतः चिकित्सीय लापरवाही और आपात-उद्धार के सन्दर्भों में लागू किया है, जहाँ वे सच्ची जीवन-रक्षक आवश्यकता को लापरवाह या स्वार्थी आचरण से अलग करती हैं, और उपबंधों के बारे में कठोर रही हैं — विशेषकर वहाँ संरक्षण न देने में जहाँ मृत्यु का इरादा था या जहाँ हानिकारक कृत्य का कोई रक्षक उद्देश्य नहीं था।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा का अर्थ यह नहीं है कि डॉक्टर बिना सहमति के मरीज पर कुछ भी कर सकते हैं, बस उसे ‘सद्भावना’ कहकर।

    तथ्य: यह सुरक्षा संकीर्ण है — यह तभी लागू होती है जब समय रहते सहमति लेना सच में असंभव हो, और यह जानबूझकर हत्या को तथा ऐसी हानि को जो मृत्यु या गम्भीर चोट रोकने से असंबद्ध हो, बाहर रखती है।

  • मिथक: यदि किसी की मृत्यु उस समय हो जाए जब आप उसकी मदद करने की कोशिश कर रहे थे, तो आपको स्वतः ही संरक्षण नहीं मिल जाता।

    तथ्य: संरक्षण आपके वास्तविक इरादे और उद्देश्य पर निर्भर करता है — यदि आपका कृत्य लापरवाह था या उसका लक्ष्य मृत्यु या गम्भीर हानि को रोकने के अलावा कुछ और था, तो उपबंधों के अनुसार यह अपवाद लागू नहीं होगा।