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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 26

Act not intended to cause death, done by consent in good faith for person’s benefit

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पुराने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 88 की तर्क-शृंखला को आगे बढ़ाते हुए) मान्यता देता है कि चिकित्सीय उपचार, शल्यक्रिया और ऐसे ही लाभकारी किंतु जोखिमभरे कार्य असंभव हो जाते यदि हर दुष्प्रभाव या जटिलता को अपराध माना जाता। यह सहमति के माध्यम से व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और कर्ता की सद्भावना से सहायता करने के उद्देश्य के बीच संतुलन बनाता है, और एक साफ़ रेखा खींचता है: यह सुरक्षा कभी भी मृत्यु का आशय रखने वाले कृत्यों पर लागू नहीं होती, जिससे वास्तविक उपचार को इच्छामृत्यु (euthanasia) या हत्या से अलग ठहराया जाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, समान पूर्ववर्ती धारा 88 आईपीसी की व्याख्या करते हुए, निरंतर यह माना है कि सद्भावना और वास्तविक सहमति अनिवार्य हैं—धोखे, दबाव से प्राप्त सहमति, या ऐसे व्यक्ति से ली गई सहमति जो जोखिम समझने में अक्षम हो (जैसे अल्पवयस्क या अभिभावक की सहमति के बिना अचेत रोगी), इस सुरक्षा के दायरे में नहीं आती। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि कर्ता का उद्देश्य कभी मृत्यु कारित करना नहीं होना चाहिए, ताकि वैध चिकित्सीय जोखिम और दंडनीय मानव वध में भेद बना रहे; यह तर्क शल्य लापरवाही और सहमति-विवाद वाले मामलों में लागू किया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा रोगी की सहमति होने पर भी दया-मरण या इच्छामृत्यु (euthanasia) की अनुमति नहीं देती।

    तथ्य: यह धारा स्पष्ट करती है कि मृत्यु का आशय रखने वाले कृत्य इसके बाहर हैं—यह केवल उन कृत्यों को संरक्षण देती है जिनका उद्देश्य मारना नहीं है, भले मृत्यु का जोखिम ज्ञात हो।

  • मिथक: किसी भी सहमति-पत्र पर रोगी के हस्ताक्षर अपने-आप चिकित्सक को इस धारा के अंतर्गत संरक्षण नहीं दे देते।

    तथ्य: न्यायालय अपेक्षा करते हैं कि सहमति वास्तविक, सूचित और सद्भावनापूर्ण परिस्थितियों में दी गई हो; धोखे से प्राप्त सहमति या ऐसे व्यक्ति की सहमति जो जोखिम समझने में अक्षम हो, मान्य नहीं मानी जाती।