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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 25

Act not intended and not known to be likely to cause death or grievous hurt, done by consent

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता (Section 87) से चले आ रहे सिद्धांत को आगे बढ़ाता है, जो वैयक्तिक स्वायत्तता को मान्यता देता है—वयस्क लोग खेल-कूद या अन्य सहमति-आधारित गतिविधियों में हल्के नुकसान के जोखिम स्वेच्छा से स्वीकार कर सकते हैं, और इससे सामान्य भागीदार अपराधी नहीं बनते। यह एक रेखा खींचता है: सहमति तभी क्षम्य ठहराती है जब न तो मृत्यु/गंभीर चोट पहुँचाने का इरादा हो और न ही उसकी संभाव्यता का ज्ञान। यदि किसी को गंभीर चोट या मृत्यु की आशंका थी, तो केवल सहमति उसे नहीं बचाती।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने परंपरागत रूप से ऐसे प्रावधानों को खेल-कूद और कड़े शारीरिक मुकाबलों पर लागू किया है—स्वीकृत नियमों के तहत निष्पक्ष खेल को अपराध नहीं माना गया; परंतु लापरवाह या फाउल आचरण से हुई गंभीर हानि पर सहमति रक्षा नहीं देती। अदालतें उस चोट में भेद करती हैं जो दोनों पक्षों द्वारा स्वीकृत जोखिम का अनुषंगी परिणाम हो, और उस चोट में जो खेल की सामान्य सीमाओं से बाहर के दुराचरण से हुई हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी भी गतिविधि के लिए दी गई सहमति का अर्थ यह नहीं है कि चाहे जितनी भी गंभीर चोट लगे, आपको कभी अपराध नहीं ठहराया जा सकता।

    तथ्य: कानून केवल ऐसी हानि को संरक्षण देता है जो न तो जानबूझकर पहुँचाई गई हो और न ही जिसके बारे में मृत्यु या गंभीर चोट की आशंका का ज्ञान रहा हो; जानबूझकर की गई गंभीर चोट मात्र भागीदारी की सहमति से क्षम्य नहीं होती।

  • मिथक: यह प्रावधान उन बच्चों या अवयस्कों पर भी लागू होता है जो जोखिमभरे खेलों के लिए राज़ी हों।

    तथ्य: यह प्रावधान केवल अठारह वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों पर लागू होता है जो सहमति दें; अवयस्क की सहमति पर यह सुरक्षा नहीं मिलती।